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शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

ग्लोबलाईजेशन और लिब्रलाईजेशन के नाम पर भारतीय बाजार विदेशियों के नियंत्रण में

भूमण्डलीकरण(ग्लोबलाईजेशन)और लिब्रलाईजेशन के नाम प्रतियोगिता हुई है या एकाधिकार स्थापित हुआ है भारतीय बाजार में ?

ऐसे ही एक दूसरा उदाहरण मैं आपको देना चाहता हूँ कि ढेर सारी Cosmetics की कंपनियाँ भारतीय बाजार में आई हैं अमेरिका की, उसमें से सबसे बड़ी कंपनी है Revlon अमेरिका की Cosmetics की सबसे बड़ी कंपनी है उसे हमारे बाजार में खुली छूट मिली है तो क्या प्रतियोगिता थी जब Revlon भारत में आया तो Hindustan lever भी था बाजार में जो आधा स्वदेशी आधा विदेशी मानता था अब तो उनकी Majority हो गई है बाजार में, हमारे देश में सबसे बड़ा प्रतियोगी था बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये तो वो Lakme, TATA घराने का और Lakme का बाजार का जो नियंत्रण था उसकी कल्पना हम कर नहीं सकते अब तो चला गया, एक जमाने में भारतीय बाजार में 80% अपना अधिकार रखता था। 
तो बाजार में आपने विदेशियों को आने की खुली छूट दी और झूठ ये बोला सारे देश के लोगों के साथ कि हम प्रतियोगिता करवाना चाहते हैं बाजार में, और वो प्रतियोगिता करते-करते एक दिन हमने समाचार पत्र में सवेरे ही सवेरे पढ़ा कि Lakme भी चला गया विदेशी कंपनी के कब्जे में, Hindustan lever ने उसको भी Takeover कर लिया। तो फिर प्रश्न मन में यही आता है कि जब Hindustan lever बाजार में था, Revlon बाजार में था और हमारे देश का Lakme था तब प्रतियोगिता अधिक थी या अब प्रतियोगिता अधिक है जब Lakme पूरी तरह से विदेशी हो गया। ठीक यही प्रयास हुआ Asian paints के साथ, ये प्रयास लेकिन सफल नहीं हो पाया। ICI Company ने Asian paints को Takeover करने का पूरा प्रयास किया उसमें वो सफल नहीं हो पाये उसमें एक भारतीय Holder में थोड़ी  भारतीयता पैदा हो गई तो उन्होंने मना कर दिया कि नहीं बेचूँगा, ऐसे यधपि कम लोग मिलते हैं इस देश में। तो प्रयास उनका असफल हो गया Otherwise इस देश की Private sector की सबसे बड़ी जो घरेलू कंपनी जो Paint बनाती है । Asian paints वो चली गई ICI के नियंत्रण में, तो प्रतियोगिता हो कहाँ रही है बाजार में तो एकाधिकार होता चला जा रहा है हम देख रहे हैं हमारी आँखों के सामने एकाधिकार हो रहा है। प्रतियोगिता देने वाला कभी टामको हुआ करता था बाजार में तो वो टामको चला गया Hindustan lever के पेट में तो प्रतियोगिता देने वाले जो 36 बड़े Empire इस देश में थे वो तो जा चुके हैं पिछले 7 वर्षो में विदेशी कंपनियों के पेट में, प्रतियोगिता हुई है या एकाधिकार स्थापित हुआ है बाजार में ?
और मैं एक सूचना के लिये आपको कह दूँ कि विदेशी कंपनियाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कभी भी प्रतियोगिता में विश्वास नहीं रखती है ये आप जान लीजिये, हमेशा Cartelization में विश्वास रखते हैं वो Cartel बनाते हैं और ये जो चक्कर हमारे देश में चल रहा है प्रतियोगिता के नाम पर नियंत्रित करने का पूरी अर्थ-व्यवस्था को, बाजार में एकाधिकार का ये चक्कर अमेरिका में भी चल रहा है अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ आपस में Merge कर रही हैं। IBM और ICL दोनो के Merge होने की तैयारी चल रही है। इस समय Boeing और General Motors आपस में Merge करने को तैयार बैठे हैं, राजयोन कार्पोरेशन और जनरल इलेक्ट्रानिक्स Merge करना चाहते हैं तो सारी की सारी अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में हम देख रहे हैं कि सिवाय Cartelization के कुछ हो नहीं रहा है। 
वहाँ क्या हो रहा है जो भी कंपनी बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकती है या तो अपने मे मिला लो या बाजार से उसको बाहर कर दो। "Either Co-operate or Corrupt" यही Principle है । लोकतंत्र का वही Principle बाजार में है, बहुराष्ट्रीय के माध्यम से या तो भारतीय कंपनियों को Takeover कर लो या तो उनको बाजार से बाहर कर दो किसी भी तरीके से, तो प्रतियोगिता हुई कहाँ है पिछले 7 वर्ष में इस बाजार में ? और फिर आपको दूसरी बात ये कहना चाहता हूँ कि प्रतियोगिता किसके बीच हो सकती है? प्रतियोगिता शब्द की Defination है यदि उसको हम समझने का प्रयास करें तो जो 19-20 का पार्टनर हो तो उसमें प्रतियोगिता हुआ करती है लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि एक तरफ वेन जानसन खड़ा है दूसरी ओर एक टाँग वाला कोई नवजवान खड़ा है और कहो कि 100 मीटर स्पीड दौड़ो वहाँ प्रतियोगिता नहीं हुआ करती कभी, मैं आपको कहना ये चाहता हूँ कि एक तरफ तो दुनिया के 60-70-75 देशों में व्यापार करने वाले बहुराष्ट्रीय हैं जिनका एक-एक वर्ष का Turnover भारत सरकार के राष्ट्रीय बजट से की गई है से कई-कई गुना अधिक है और दूसरी तरफ हमारे देश केSmall scale उधोग हैं जो 50 हजार में, 10 हजार में, 1 लाख में, 1 करोड़ में, 2 करोड़ में काम करती हैं। 
1 करोड़ 2 करोड़ में काम करने वाला व्यकित 500 करोड़ वाले के व्यापार करने वाले के साथ प्रतियोगिता करेगा या उसके पेट में समा जायेगा कैसे संभव है ? ये तो आप प्रतियोगिता शब्द का अपमान कर रहे हैं ये कहकर कि हमारे Small scale को उनके साथ प्रतियोगिता करना चाहिये कभी संभव नहीं हो सकता है। संभव हो सकता है हमारे देश के जो Joint सार्वजनिक क्षेत्र हैं वो कर सकते हैं प्रतियोगिता बहुराष्ट्रीय के साथ उनमें वो शकित है और हमारे देश के जो सार्वजनिक क्षेत्र बहुराष्ट्रीय के साथ प्रतियोगिता करने की शकित रखते हैं उनकी ये क्षमता है उन्हीं सार्वजनिक क्षेत्र को जानबूझकर भारतीय बाजार से बाहर करने की चाल चली जा रही है। 
मैं आपको दावे के साथ कहता हूँ कि अमेरिका की एण्ड्रोन कंपनी को यदि कोई टक्कर दे सकता है तो वो BHEL दे सकता है BHEL में वो शकित है कि वो एण्ड्रोन को टक्कर दे सके और BHELवालों का ये दावा है कि हमसे आप बिजली तैयार करवाओ तो हम 1 रुपये 70 पैसे प्रति यूनिट बिजली देने को तैयार हैं, लेकिन BHEL का आप प्रपोज़ल नहीं लेंगे एण्ड्रोन का लेंगे क्योंकि वह 4.5 रुपये प्रति यूनिट बिजली देने वाला है। और आप कहोगे कि BHEL प्रतियोगिता करे एण्ड्रोन के साथ ये कैसे संभव है। छोड़ दो ना बाजार में यदि आप ये विश्वास करते हो कि प्रतियोगिता होना चाहिये बाजार में, तो आपने Tender आमंत्रित क्यों नहीं किये भारत के सार्वजनिक क्षेत्र से? क्यों आपने एण्ड्रोन के साथ सनिध होने दिया? इस देश में हो जाने देते जिसका सबसे कम बिजली बिल निकलता उसको प्रोजेक्ट दे दिया जाता वो तो हुआ नहीं इस देश में, प्रतियोगिता हो कहाँ रही है इस देश में ? प्रतियोगिता के नाम पर आपके बाजार में एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास हो रहा है और हमको जितनी विलम्ब से समझ में आयेगा उतनी ही हानि हो चुकी होगी इस देश कि अब तक 36 बड़े Empire जा चुके हैं विदेशियों के नियंत्रण में और अगले 2-3 वर्ष यही चलता रहा तो बचे-खुचे जो हैं वो भी चले जायेंगे विदेशियों के कब्जे में ।

दक्षिण कोरिया बर्बाद हुआ वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की शर्ते पर चल कर

दक्षिण कोरिया की सरकार ने ईमानदारी के साथ IMF और विश्व बैंक की शर्तो को 1991से पालन किया ।

 


दूसरी बात दक्षिण कोरिया सरकार से कही IMF के अधिकारियों ने कि आपके देश का जो पब्लिक सेक्टर जो है उसको भी खुला छोड़ दीजिये और आप इनका निजीकरण शुरु कर दीजिये क्योंकि पब्लिक सेक्टर को खामखाँ आप बोझे की तरह ढोते रहेंगे आप अपनी छाती पर तो ये आपके लिये नुकसान देगा। तो दक्षिण कोरिया सरकार ने वो भी कर दिया कुछ निर्यात भी उनका 1-2 वर्ष काफी गति से होने लगा। फिर चौथी बात उन्होंने कहना ये शुरु किया आपके अपने बाजार में जो घरेलू उद्योग हैं दक्षिण कोरिया की उनके ऊपर जो अपने प्रोटेक्शन दे रखे हैं उन सुरक्षा को वापस कर लीजिये ताकि दक्षिण कोरियन उद्योग अमरीकी उद्योग के साथ प्रतिस्पर्धा में आ सके और प्रतिस्पर्धा जब आयेगी दक्षिण कोरिया इंडस्ट्री में, तो अमरीकी कंपनियों से शकितशाली प्रतिस्पर्धा हो पायेगी तो गुणवत्ता में सुधार होगी इत्यादि-इत्यादि, उन्होंने वो भी कर दिया। फिर उन्होंने ये कहा कि आप अपने फाईनेंशियल मार्केट को खोल दीजिये तो दक्षिण कोरिया ने सिओल का जो स्टॉक एक्सचेंज है उसे पूरी तरह खोल कर अमरीकी लोगों के हाथ में दे दिया कि ले लीजिये इतना खोल दिया अपने बाजार में। 

फिर उन्होंने इसके बाद एक और बात कही कि दक्षिण कोरिया में बहुत पहले से घरेलू उधोग को प्रोटेक्ट करने के लिये एक Anti dumping law चला करता था तो दक्षिण कोरिया सरकार को कहा IMF के अधिकारियों ने कि Anti dumping law भी वापस कर लीजिये, तो दक्षिण कोरिया सरकार ने वो भी कर लिया और उसके बाद उन्होंने कहा कि अब ऐसा कीजिये अपने देश की अर्थ-व्यवस्था को अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था के साथ पूरी तरह जोड़ने के लिये आप अमेरिका के साथ पूरी तरह घुल-मिलकर अब ग्लोबलाईज हो जाइये माने हमारे साथ शामिल हो जाइये, विश्व बाजार में उसके लिये हम जैसे-जैसे कहें वैसे-वैसे चलते जाइये। 

भारतीय संसद में दक्षिण कोरिया को एशियन टाईगर कहाँ गया है
बेचारी दक्षिण कोरिया की सरकार उस मार्ग पर भी चलने लगी और मैं आपको इसी समय एक दूसरी बात कहना चाहता हूँ कि जिस समय ये सब कुछ दक्षिण कोरिया में हो रहा था उसी समय हमारे देश के संसद में हमारे पूर्व वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बहुत लंबा भाषण दिया है डेढ़ घण्टे का, वो भाषण की कॉपी मेरे पास है वो संसद की Proceeding में छपा हुआ भाषण है, भारतीय संसद को संबोधित कर रहे हैं कि हमको रिफार्म से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है और हमारे देश में कुछ लोग हैं वो नाम तो नहीं लूँगा उसमें शायद हमारे जैसे लोग शामिल होंगे तो वो कह रहे हैं कि हमारे देश में कुछ लोग हैं जो भूमण्डलीकरण (ग्लोबलाईजेशन) के बारे में गलत प्रचार कर रहे हैं हमारे देश में, भूमण्डलीकरण से तो बहुत लाभ होने जा रहा है इस देश में, और ये भूमण्डलीकरण (ग्लोबलाईजेशन) यदि दो-तीन वर्ष हमारे देश में चालू रहा तो हम बहुत प्रगति कर लेंगे जो प्रगति शायद पिछले 40 वर्षो में नहीं हो पाई अगले 5 वर्षो में हम करने जा रहे हैं और उन्होंने अपने भाषण में नाम लेकर दक्षिण कोरिया का जिक्र किया और वो करीब 20 मिनट दक्षिण कोरिया की अर्थ-व्यवस्था पर वो बोले हैं। मनमोहन सिंह तो दक्षिण कोरिया की अर्थ-व्यवस्था पर बोलते हुये वो कह रहे हैं कि देखो दक्षिण कोरिया भी पूरी तरह से खुल गया है पूरी तरह से भूमण्डलीकरण हो गया है और वहाँ पर अब घरेलू उद्योग का प्रोटेक्शन भी समाप्त कर दिया गया है वगैरह-वगैरह।

उनका फाईनेंशियल मार्केट खुल गया है उनके घरेलू बाजार में भी विदेशी कंपनियों को खुली छूट मिल गई है और अंत में बोलते-बोलते क्या कह रहे हैं वो, अब तो दक्षिण कोरिया 'एशियन टाईगर' हो गया है ये जो उन्होंने कह दिया भारतीय संसद में कि दक्षिण कोरिया एशियन टाईगर हो गया है तो हमारे देश के अंग्रेजी समाचार पत्रों ने इसे लपक लिया और भारत के सारे बड़े अंग्रेजी समाचार पत्रों नें उन्हीं समाचार में कुछ थे जिनमें ये छपना शुरु हो गया कि दक्षिण कोरिया तो एशियन टाईगर, जब भी दक्षिण कोरिया के बारे में कोई बात आये तो दक्षिण कोरिया का विशेषण हमेशा एशियन टाईगर । तो एशियन टाईगर वो क्यों है ? क्योंकि जो कुछ भी IMF ने कहा विश्व बैंक ने कहा अमेरिका की सरकार की ओर से जो भी बातें उनके यहाँ आई वो सब के सब उन्होंने लागू कर दी हैं। 

दक्षिण कोरिया की अर्थ-व्यवस्था 7 वर्ष में भूमण्डलीकरण परिणाम क्या निकले ?

तो दक्षिण कोरिया बेचारा चलता गया चलता गया चलता गया 7 वर्ष बीत गये, दक्षिण कोरिया को एक दिन लगा कि जो कुछ हमने 7 वर्ष पहले चालू किया था उसके परिणाम तो दिखते नहीं कभी भी और उल्टी स्थिति अवश्य दिखाई दे रही है, दक्षिण कोरिया में क्या उल्टी स्थिति दिखाई दे रही है ? कि पिछले वर्ष नवम्बर के महीने में दक्षिण कोरिया की संसद में वहाँ के वित्त मंत्री ने भाषण देते हुये कहा कि हमको ये उम्मीद थी कि 7 वर्षों में भूमण्डलीकरण के सारे परिणाम  हमारे पास आ जायेंगे लेकिन 7 वर्ष तक प्रतीक्षा करने के पश्चात परिणाम आना तो दूर किसी उल्टी दिशा में जा रहे हैं ऐसा अनुभव हो रहा है। ये नवम्बर प्रथम सप्ताह में भाषण दे रहे हैं वित्त मंत्री, फिर एक दिन दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति 'किन इल सुंग का भाषण हुआ संसद में तो वहाँ के राष्ट्रपति ने कहना शुरु कर दिया कि हमको अब ग्लोबलाईजेशन और लिब्रलाईजेशन पर एक श्वेत पत्र तैयार करना चाहिये और दक्षिण कोरिया की संसद में उसको पेश करना चाहिये ताकि पता तो चले कि पिछले 7 वर्षो में लाभ कितना हुआ है हानि कितनी हुई है और अभी ये बात चल ही रही थी हम जो है श्वेत पत्र तैयार करेंगे और संसद में पेश करेंगे कि तीसरे कि चौथे दिन समाचार पत्र में समाचार आया कि सिओल का पूरा का पूरा स्टॉक एक्सचेंज का मार्केट धराशायी हो गया कोलेप्स हो गया और जिन दक्षिण कोरियन शेयर के दाम सामान्य रूप से कभी गिरे नहीं, धरती पर  औंधे मुँह पड़े हैं ये अचानक से समाचार पत्र में यह समाचार आई और उसी समाचार के एक सप्ताह के अंदर दक्षिण कोरियन राष्ट्रपति 'किन इल सुंग का एक दूसरा वक्तव्य आ गया जिसमें उन्होंने कह दिया कि हम तो पूरी तरह से बर्बाद हो गये और दोनो हाथ उठाकर उन्होंने सरेण्डर कर दिया ? उसी समय वर्ल्ड इकोनामिक फोरम की एक बैठक चल रही थी तो वर्ल्ड इकोनामिक फोरम में दक्षिण कोरिया का एक प्रतिवेदन भेजा गया प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की ओर से दक्षिण कोरिया के एक मंत्री ने उसको पढ़ा और वर्ल्ड इकोनामिक फोरम में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का प्रतिवेदन जो एक मंत्री द्वारा पढ़ा गया उसके जो शब्द थे वो क्या कि हम पूरी तरह से डूब गये हैं ये ग्लोबलाईजेशन और लिब्रलाईजेशन ने हमको कहीं का नहीं छोड़ा और अब हम दुनिया के लोगों से और दुनिया के तमाम वित्तीय संस्थानों से अपील करना चाहते हैं कि वो हमारे ऊपर जितना ऋण है उसको क्षमा कर दें क्योंकि हम उस ऋण को चुकाने की भी सिथति में नहीं है और वो मैं भूलता नहीं उस राष्ट्रपति का जो शब्द है वो ये कि हम पूरी तरह से दिवालिया (Bankrupt) हो गये हैं और उसके बाद एक दूसरी चिठ्ठी गई है उसकी, और उस दूसरी चिठ्ठी में IMF और विश्व बैंक  के अधिकारियों से कहा कि हमने तो आपके कहे हुये दिशा निर्देशों का ही पालन किया पूरी तरह से, पूरी ईमानदारी के साथ ग्लोबलाईजेशन को लागू किया अपने देश में, लेकिन परिणाम ये है कि हम दिवालिया हो चुके हैं अब हम आपका एक भी पैसे का ऋण वापस नहीं चुका सकते लिहाजा IMF हमारे सारे के सारे ऋण को क्षमा कर दे या फिर हमको नया ऋण दिया जाये कि हम पुराने कर्जे का ब्याज चुका सकें और IMF ने उनकी इस बात को स्वीकार करते हुये कह दिया कि हम आपको ऋण देने को तैयार हैं तो कितना ऋण चाहिये तो दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने कहा 60 बिलियन डालरतो IMF ने कहा बिल्कुल ठीक हम आपको 60 बिलियन डालर का लोन दे देंगे तो हमारी छोटी सी हमारी अंतिम शर्त है कि आप दक्षिण कोरिया की देश की सारी की सारी राष्ट्रीय सम्पति (National Assests) हमारे पास गिरवी रख दीजिये। अब दक्षिण कोरिया के सरकार की स्थिति ये है वो जो होती है ना साँप-छुछुन्दर वाली वो ये है मरता क्या ना करता, तो देख लिया कि डूबने वाले हैं मर गये तो क्या ना करें तो उस पर भी हस्ताक्षर कर दिया और आज उनकी स्थिति ये है कि दक्षिण कोरिया की जो राष्ट्रीय सम्पति (National Assests) हैं राष्ट्रीय संपत्ति हैं वो गिरवी रखे जा चुके हैं और दक्षिण कोरिया में इतना जबरजस्त प्रतियोगिता हुआ है पिछले 7 वर्षो में कि दक्षिण कोरिया के सारे के सारे सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने अमरीकी कंपनियों के कंट्रोल में चले गये हैं। प्रतियोगिता के नाम पर वहाँ पर सिवाय एकाधिकार (मोनोपाली) के कुछ हुआ नहीं है। 

दक्षिण कोरिया की कंपनीयों का क्या हाल हुआ ?

एक उदाहरण से समझिये कि आज से 7-8 वर्ष पहले तक दक्षिण कोरिया की कार बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी जिसका नाम है  ^Haundai Motors* उसके ऊपर वहाँ के लोगों को भी गर्व था वहाँ के सरकार को भी गर्व था तो Haundai Motors पूरी तरह से अब अमेरिकी कंट्रोल में है इस समय, और Haundai Motors पर पूरी तरह से अमेरिकन कंपनी का कंट्रोल स्थापित हुआ है, तो अमेरिकी कंपनी जनरल मोटर्स उसे टेक ओवर करने के बाद सबसे पहला काम जो किया वो ये कि हुण्डाई मोटर में जितने भी काम करने वाले कर्मचारी हैं उनको निकाल दिया और सड़क पर खड़ा कर दिया, दक्षिण कोरिया में इस समय करीब-करीब 70 लाख कर्मचारी अब बेरोजगार हो गये हैं। ये Haundai Motors तो उसका एक उदाहरण है ऐसी 100 से अधिक कंपनियाँ दक्षिण कोरिया की अमेरिका के कंट्रोल में जा चुकी हैं। तो ये हुआ 7 वर्ष के ग्लोबलाईजेशन में उनका व्यापार घाटा इतना अधिक बढ़ गया है कि मुद्रा के अवमूल्यन का जो काम शुरु किया था उसके परिणाम बहुत भयंकर निकले हैं। अंत में परिणाम ये निकला है कि उनके राष्ट्रपति ने ये कह दिया है कि ये ग्लोबलाईजेशन नहीं हुआ है Economic recolonization हुआ है 

भारत भी उसी रास्ते पर क्यों चल रहा है ?

दक्षिण कोरिया की मेरे मन में पीड़ा क्या है, मेरे मन में पीड़ा ये है कि मेरे संसद में दक्षिण कोरिया के बारे में 'एशियन टाईगर कहा गया था जिस दक्षिण कोरिया के बारे में पिछले 7 वर्ष से पानी पी-पीकर कसीदे पढ़े जा रहे थे दक्षिण कोरिया के बारे में, आज दक्षिण कोरिया जब धराशायी हो गया है तो ना तो डॉ. मनमोहन सिंह का कोई वक्तव्य आया है ना पी.चिदम्बरम का कोई वक्तव्य आया है, क्यों ? इनको डर लग रहा है कि दक्षिण कोरिया जिस मार्ग पर डूबा है यदि हमने कुछ कहना शुरु किया तो इस देश में हमारी भी पोल-पट्टी खुल जायेगी क्योंकि हमने भी रास्ता तो वही पकड़ा है जो दक्षिण कोरियन सरकार ने पकड़ा था 1991 में,  और मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ दक्षिण कोरिया जब धराशायी हुआ तो उसके बाद हर दिन मैने समाचार पत्र पढ़ा कि देखें भारत के वित्त मंत्री क्या कहते हैं देखें भारत के पूर्व वित्त मंत्री क्या कहते हैं देखें भारत के वो तमाम अर्थशास्त्री क्या कहते हैं जिन्होंने भारत में ढोल पीट-पीटकर ग्लोबलाईजेशन का समर्थन किया था और देखें भारत के वो बड़े संस्थान क्या कहते हैं दक्षिण कोरिया के बारे में, आज तक किसी ने मुँह नहीं खोला है। 'Assocham' में मैं गया मैने पूछा क्यों नहीं मुँह खोलते हो? कहने लगे राजीव भाई किस मुँह से बोलें, Ficci के लोगों से कहा कि आप क्यों नहीं बोलते हो? तो बोले किस मुँह से बोलें। हम ही तो ये ढोल पीट-पीट कर कह रहे थे कि ग्लोबलाईजेशन भारत में स्वर्ग लायेगा, अब हम कैसे कहें इस बात को? अब मैं दक्षिण कोरिया के वित्त मंत्री के एक वक्तव्य को मैं कोट करना चाहता हूँ उनका ये कहना है कि पिछले 7 वर्ष में जो बर्बादी हो गई है हमारे देश में अर्थ-व्यवस्था की, इस बर्बादी को दूर करें और अपने को फिर से खड़ा करें या प्रयास करें तो हमको कम से कम 20 वर्ष लग जायेंगे। 

दूसरा उदाहरण इण्डोनेशिया किस प्रकार बर्बाद हुआ वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ संस्थो

इण्डोनेशिया में स्थिर्ता है और पिछले 35 वर्ष से एक ही राष्ट्रपति बनता चला  आ रहा है, तो क्यों डूबा इण्डोनेशिया ?

ऐसे ही मैं दूसरा उदाहरण आपसे शेयर करना चाहता हूँ इण्डोनेशिया का, इण्डोनेशिया वो देश है जहाँ स्थायी सरकार है। पिछले 40-45 वर्षो से बहुत लोगों को बहुत गलतफहमी है इस देश में कि हमारे यहाँ चूँकि राजनीतिक अस्थिर्ता अधिक है इसलिये इस देश में समस्यायें अधिक हैं। मैं इस गलतफहमी को दूर करना चाहता हूँ। इण्डोनेशिया में पिछले 45 वर्ष से भयंकर स्थिर्ता है और पिछले 35 वर्ष से एक ही राष्ट्रपति बनता चला  आ रहा है 'सुकर्णो '  7 बार वो राष्ट्रपति बन चुका है और 5 वर्ष का एक कार्यकाल होता है और 35 वर्ष से वो राष्ट्रपति है अभी 8 वीं बार फिर चुन लिया गया है अभी हफ्ते भर पहले । तो दक्षिण कोरिया के बारे में तो हम कह सकते हैं कि वहाँ अस्थिर्ता थी सरकार बदलती रही है ये बात सही है। पिछले 7 वर्ष में दक्षिण कोरिया में 4-5 सरकार बदली लेकिन इण्डोनेशिया में तो पिछले 35 वर्ष से एक ही व्यकित राष्ट्रपति बनता रहा है और उसी की सरकार पिछले 35 वर्ष से चल रही है और 8 वीं बार वो फिर राष्ट्रपति बन गया है। तो भयंकर स्थिर्ता थी तो क्यों डूबा इण्डोनेशिया? इण्डोनेशिया की सरकार को भी यही प्रिसिक्रप्शन मिला था IMF की ओर से कि आप एक काम करिये अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना शुरू कर दीजिये आपका निर्यात बहुत बढ़ जायेगा और जब निर्यात बहुत बढ़ जायेगा तो डालर्स बहुत आयेंगे आपके पास, आपके पास विदेशी मुद्रा भण्डार बहुत अच्छे हो जायेंगे वगैरह-वगैरह, और आप Export oriented के मार्ग पर चलना शुरु कर देंगे। 

इण्डोनेशिया की सरकार ने पूरी ईमानदारी से इसे पालन करना शुरु कर दिया, तो इण्डोनेशिया में जब ग्लोबलाईजेशन शुरु हुआ था उस समय उनकी जो मुद्रा थी इण्डोनेशिया की मुद्रा है रुपइया, हमारी मुद्रा है रुपया, तो इण्डोनेशिया की जो मुद्रा है रुपइया वो एक डालर में 40 रुपइया होता था जब ग्लोबलाईजेशन शुरु हुआ था फिर उसके बाद क्या हुआ दना-दन मुद्रा का अवमूल्यन करना शुरु कर दिया, IMF का यह प्रिसिक्रप्शन था कि जितना अधिक आप अवमूल्यन करेंगे उतना निर्यात सस्ता हो जायेगा और माल आपका बिकता चला जायेगा। तो अवमूल्यन करते-करते कहाँ तक ले आये आप कल्पना कर सकते हैं इस समय इण्डोनेशिया में 1 डालर में 17000 रुपइया मिलता है उन्होंने रिकार्ड तोड़ अवमूल्यन किया अपनी मुद्रा का और इस आशा में कि चला इस वर्ष हमारा निर्यात बढ़ेगा इस वर्ष नहीं तो अगले वर्ष बढ़ेगा फिर अगले वर्ष बढ़ेगा फिर अगले वर्ष बढ़ेगा, तो 7 वर्ष से वो सपना देखते आये हैं कि अब देखो निर्यात बढ़ गया अब देखो निर्यात बढ़ गया और इस समय स्थिति ये हैइण्डोनेशिया की का निर्यात पूरी तरह से ठप्प है और अब इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो साहब ने कह दिया कि हमने अपने जीवन में भयंकर भूल की जो IMF के कहने पर ग्लोबलाईजेशन चालू किया अपने देश में, ये इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति का वक्तव्य है। 

इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति ने शपथ लेने के बाद क्या भाषण दिया है  ?

राष्ट्रपति ने शपथ लेने के बाद जो भाषण दिया है इण्डोनेशिया के संसद में वो शब्द ये हैं कि हमने भयंकर भूल की हैं जो IMF के कहने पर ग्लोबलाईजेशन अपने देश में चालू किया है। परिणाम क्या निकले हैं इण्डोनेशिया भी पूरी तरह से डूब चुका है और वहाँ की सरकार भी कह रही है कि अब इस देश को वापस खड़ा करने में कम से कम 15 से 20 वर्ष लग जायेंगे। इण्डोनेशिया की समाचारें भारत में करीब-करीब रुकी हुई हैं क्योंकि हमारे देश के समाचार पत्रों अभी इतनी चेतना का स्तर नहीं उठ पाया है कि जिन देशों में ये दुर्घटनायें हो रही हैं उनका कवरेज ठीक से करें कभी एकाध घटनायें आ जाती हैं छिटपुट। 
जैसे अभी परसों मैं देख रहा था एक फोटोग्राफ है इण्डोनेशिया का, पुलिस लाठी चार्ज कर रही है और किसानो का भयंकर प्रदर्शन हो रहा है संसद के बाहर, तो सेना खड़ी है तोप लेकर, वो फोटोग्राफ मैने देखा एक समाचार पत्र में समाचार क्या है समाचार नहीं है समाचार का बस ब्लाक आउट किया गया है और लिख दिया गया है कि आर्थिक लिब्रलाईजेशनई के बाद वहाँ जो गरीबी बढ़ी है, बेरोजगारी हुई है और लोगों में जो निर्धनता उत्पन्न हुई है उसके कारण मारा-मारी हो रही है संसद के सामने प्रदर्शन होते हैं पुलिस का लाठी चार्ज होता है प्रतिदिन आर्मी अपने डण्डे बरसाती है बंदूकें चलती हैं और लोग प्रतिदिन मरते हैं उसका एक नमूना है।

तीसरा उदाहरण थाईलैण्ड किस प्रकार बर्बाद हुआ वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ संस्थो के साथ चलते

तीसरा उदाहरण थाईलैण्ड किस प्रकार बर्बाद हुआ वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ संस्थो के साथ चलते

एक और देश है 'थाईलैण्ड उसकी तो अजब ही कहानी है ग्लोबलाईजेशन की, थाईलैण्ड ने 1990 में शुरु किया था ग्लोबलाईजेशन और थाईलैण्ड की अर्थ-व्यवस्था तो इण्डोनेशिया और दक्षिण कोरिया की तुलना में सिटी कंट्री जैसा है हमारी तुलना में भी दो जिला के बराबर है थाईलैण्ड की अर्थ-व्यवस्था, लेकिन इन्होंने भी इसी दौड़ में शामिल होकर कि अब देखिये ग्लोबलाईजेशन शुरु हो रहा है हम पीछे थोड़े ही रह सकते हैं किसी से, यदि हम नहीं दौड़ेंगे सब के साथ तो हम तो पीछे रह जायेंगे तो इसी डर में इण्डोनेशिया की सरकार के साथ थाईलैण्ड की सरकार नें कदम से मिलाकर चलना शुरु कर दिया । 
हमारे देश में भी कई ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि हम पीछे थोड़े ही रह सकते हैं किसी से, अमेरिका दौड़ रहा है यूरोप दौड़ रहा है तो हमको भी तो दौड़ना है 18 वीं शताब्दी में थोड़े ही जी सकते हैं। तो ऐसे ही थाईलैण्ड में भी सरकार ने कहना शुरु किया कि हम पीछे थोड़े ही रह सकते किसी से, पड़ोसी जो कर रहा है वो हम भी करेंगे तो पड़ोसी के घर में ये हो रहा है तो हम भी करेंगे तो थाईलैण्ड की सरकार भी चालू हो गई ग्लोबलाईजेशन और लिब्रलाईजेशन करना। अब उन्होंने भी मुद्रा का अवमूल्यन करना शुरु कर दिया, उनके यहाँ क्या एक शाक लगा कि हमारे आजू-बाजू की सरकारें बहुत शार्ट टर्म लोन ले रही हैं तो चलो हम भी ले लें तो उन्होंने भी चालू कर दिया है लोन लेना और अब ऐसा लगा कि पिछले 3-4 वर्षो में जो जितना लोन ले रहा है वही सबसे बड़ा वित्त मंत्री है। 
हमारे देश में भी ऐसा है कि जो वित्त मंत्री हमारे देश में सबसे अधिक विदेशी कर्जे के गढ्डे में पहुँचा दे वही सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री है हमारे देश में, तो थाईलैण्ड में भी हो गया तो उन्होंने भी लोन लेना चालू कर दिया देखा देखी पड़ोसी के चक्कर में, अब वहाँ क्या हुआ? अब वो भी बेचारे डूब गये हैं कहते हैं लोन इतना ले लिया है वहाँ की सरकार ने जितनी उनकी राष्ट्रीय आय नहीं है विदेशी ऋण का ब्याज नहीं चुका सकते वहाँ के प्रधानमंत्री ने तो अदभुत काम किया है जिसको मैं एकदम संसार में Extreme मानता हूँ क्या किया है उस प्रधानमंत्री ने एक दिन उसने संसद में घोषणा की चूँकि हमने ग्लोबलाईजेशन लिब्रलाईजेशन कर दिया उसमें तो अब देश डूब ही गया है विदेशी ऋण बहुत चढ़ गया है उसका ब्याज भी चुकाना है हमको, और अब हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है जिसको बेचकर हम हमारे देश का ऋण चुका सकें। अब हम नई नीति ला रहे हैं यह प्रधानमंत्री कह रहा है संसद में कि हम नई नीति ला रहे हैं संसद में कि वेश्यावृत्ति को वैधानिक व्यापार बना दिया जाये तो प्रधानमंत्री कह क्या रहा है सुनिये उसके शब्दों को कि हमारे पास कुछ भी ऐसा नहीं है जिसको बेचकर हम विदेशी ऋण का ब्याज चुका सकें तो अब हम हमारी माताओं और बहनों के शरीरों को बेचेंगे उससे कुछ डालर्स आयेंगे उससे विदेशी कर्जे का ब्याज चुकायेंगे। 


थाईलैण्ड का प्रधानमंत्री भारत सरकार को चेतावनी देना चाहता हूँ ।

अंत में उसने एक बहुत बुध्दिमानी की बात कही उसने कहा कि मैं भारत सरकार को चेतावनी देना चाहता हूँ ये थाईलैण्ड का प्रधानमंत्री कह रहा है कि मैं भारत सरकार को चेतावनी देना चाहता हूँ कि वो इस ग्लोबलाईजेशन के रास्ते पर जितनी शीघ्र हो चलना बंद कर दें नहीं तो भारत को जो हानि होगी उसकी कल्पना हम नहीं कर सकते, हमारा देश तो भारत की तुलना में सिटी कंट्री है और सही बात है हमारे देश के दो जिलों के बराबर है थाईलैण्ड वो कह रहा है हमारा देश तो भारत की तुलना में सिटी कंट्री है हम डूबे हैं तो इतनी भयंकर हानि हुई है और यदि भारत डूबेगा तो कल्पना नहीं कर सकते कि कितनी क्षति होगी । 

अर्थ-व्यवस्था मे मंदी वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की मुख्य भुमिका

जिस समय यह वैश्वीकरण (ग्लोबलाईजेशन) और उदारीकरण (लिब्रलाईजेशन) शुरु हुआ था उस दिन से आज तक मैं और मेरे कई साथी पूरी बारीकी से इस पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कर रहे थे और ये हम समझना चाहते थे कि ये ग्लोबलाईजेशन है या और भी कुछ इसमें है । तो ये ग्लोबलाईजेशन शुरु हुआ तो इसके साथ बहुत सारे वायदे थे बड़ी-बड़ी बातें थीं, जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी  वो आप शायद समझते होंगे उसको, या आपको स्मरण भी होगा कि 1990-91 में हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था में थोड़ी सी मंदी आ गई थी तो उस रुकावट को दूर करना है तो सिवाय ग्लोबलाईजेशन या लिब्रलाईजेशन के इस देश के पास कोई अन्य मार्ग नहीं है, ऐसी बात पूरे देश में कही गई थी और मुझे बराबर स्मरण है कि हमारे देश के मूर्धन्य अर्थशास्त्री लोगों ने ये कहना शुरु कर दिया था कि "चूँकि देश के पास विदेशी मुद्रा का भण्डार बहुत कम रह गया है और हमारे पास बहुत कठिनाई से 3 सप्ताह तक इम्पोर्ट बिल चुकाने की मुद्रा है तो हमको तो कुछ करना ही पड़ेगा।" तो हमारे पास बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस हो गई थी तो उस बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस को दूर करने के लिये हमारी सरकार ने आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक के पास एप्रोच किया था लोन के लिये, पैसे के लिये, ऋण लेने के लिये, तो 1991 में जब आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक में भारत सरकार का पत्र गया कि भारत को शीघ्र ऋण चाहिये आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक से, तो  आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की जैसी आदत है उन्होंने सबसे पहले ये कहना शुरु कर दिया कि आपको ऋण तो देंगे लेकिन उसके साथ हमारी कुछ शर्तें होंगी, तो आई.एम.एफ. की ओर से और वर्ल्ड बैंक की ओर से भारत सरकार को कुछ शर्तें पेश की गईं कि आप इन शर्तों को पूरा करें तो हम आपको कर्ज देने को तैयार हैं। तो वो शर्तें क्या थीं ?
वर्ल्ड बैंक और आई.एम.एफ. संस्थाओं की शर्तें क्या होती हैं?

सबसे पहली शर्त है आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की, जब भी कोई देश कठिन परिस्थिति में जाता है तो उनका एक रटा-रटाया प्रिस्क्रिप्शन है कि सबसे पहले आप अपने देश की करेंसी का अवमूल्यन कीजिये तब हम आपको ऋण दे देंगे और इस बात को प्रस्तुत करने का तरीका अलग है, तो ये कहते हैं कि आप अपने मुद्रा का अवमूल्यन इसलिये करिये ताकि आपका निर्यात अधिक हो जाये और चूँकि आपका निर्यात अधिक होगा तो आप अधिक डॉलर्स कमायेंगे और आप अधिक डॉलर्स कमा सकेंगे तभी आप हमारे लिये हुये कर्ज को वापस कर सकेंगे। तो इसको यदि एक पँक्ति में कहूँ तो आई.एम.एफ. का एक प्रिस्क्रिप्शन है जो वो संसार के सभी देशों में लागू करवाती है कि आप एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कीजिये, तो ये आई.एम.एफ. का पहला प्रिस्क्रिप्शन है । 

दूसरा उनका प्रिस्क्रिप्शन है कि आप जब एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कर देंगे तो फिर एक काम और कर दीजिये अपने देश का दरवाजा खोल दीजिये कि आपके देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आसानी से आ सकें और उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर जो आप पाबंदियाँ लगाते हैं जो रिस्ट्रिक्शन लगाते हैं उनको आप कम से कम कर दीजिये या इसे समाप्त कर दीजिये ताकि आपके बाजार में उनको व्यापार करने में कोई असुविधा ना हो, और क्यों आप अपने देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाइये ? आप यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलायेंगे अपने बाजार में तो इसके साथ हाईटेक बहुत आयेगा तकनीक बहुत आयेगी और जब तकनीक बहुत आयेगी तो आपके यहाँ गुणवत्ता युक्त माल बनना शुरु हो जायेंगे तो आप निर्यात अधिक कर पायेंगे। तो बहुराष्ट्रीय भी आपके बाजार में आके आपका प्रमोशन करेंगे आपके निर्यात को बढ़ायेंगे। 

तीसरा प्रिसिक्रप्शन अक्सर उनका ये रहा करता है कि आप अपने इण्टरनल मार्केट (घरेलू बाजार) में जो घरेलू उधोग को संरक्षण देते हैं वो संरक्षण देना बंद करें और यदि आप संरक्षण देना बंद करेंगे तो उसके बारे में IMF का ये मानना है कि आप एक Conservative अर्थ-शास्त्र को चलाने का प्रयास कर रहे हैं। तो आप घरेलू उधोग को प्रोटेक्शन मत दीजिये, बहुराष्ट्रीय को खुली छूट दे दीजिये पूँजी लाने की भी खुली छूट दे दीजिये और पूँजी ले जाने की भी खुली छूट दे दीजिये उनके ऊपर किसी प्रकार की भी पाबंदी नहीं होनी चाहिये और आप सब के सब फ्री ट्रेड (मुक्त व्यापार) के लिये अपने आपको तैयार कर लीजिये फिर इसके बाद कुछ और बातें भी बताई जाती हैं जैसे एक बात ये बताई जाती है कि भारत की अर्थ-व्यवस्था Competetive नहीं है तो आप जब तक दरवाजा नहीं खोलेंगे तो तब तक आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं आयेगी और आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी आपके देश के ग्राहक को उसकी बहुत हानि होगी। तो आपकी इकानमी में प्रतियोगिता होनी चाहिये ग्राहक को उसका लाभ होना चाहिये तो इसके लिये आवश्यक है कि आप अपने बाजार में या भारत के बाजार में आने की खुली छूट दें और ऐसे-ऐसे करके वो कुछ शर्ते बताते चले जाते हैं और संसार के बहुत सारे देश हैं जो उनको लागू करते चले जाते हैं। और एक बात मैं आपको और बता दूँ कि ये जो IMF, World Bank की जो शर्ते होती हैं वो शर्ते बस संसार के निर्धन देशों पर ही लागू होती हैं, एक सूचना मैं आपको ये दे दूँ कि अमेरिका और यूरोप के देश IMF से कर्ज लेते हैं और IMF और World Bank से कर्ज लेते हैं तो जो शर्ते वो हमारे ऊपर लगाते हैं वो शर्ते अमेरिका के ऊपर नहीं लगाई जाती, क्योंकि हमेशा से वो मानके चलते हैं कि अमेरिकन इकानमी पहले से ही भूमण्डलीये है यधपि ये सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था भूमण्डलीÏत है, दूसरा उनका ये मानना है कि अमेरिकन इकानमी में बहुत प्रतिस्पर्धा है ये उससे भी बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा है। तीसरी बात जो कहते हैं कि अमेरिकन पूरी तरह से फ्री इकानमी है ये संसार का सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकन अर्थव्यवस्था फ्री अर्थ-व्यवस्था है और फिर यूरोप के बारे में भी कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। तो मेरे मन में अक्सर ये प्रश्न उठता आया है कि जब World Bank से अमेरिका भी ऋण लेता है यूरोप भी ऋण लेता है तो उनके ऊपर भी शर्ते नहीं लगाई जाती ? 
वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की शर्ते अमेरिका और अन्य यूरोपियन ब्लाक पर कभी लागु नहीं की जाती क्यों ?

हमारे जैसे देश जब उनसे ऋण जाते हैं तब उनके ऊपर तत्काल शर्ते लगा दी जाती हैं, तो एक बार मन में आया कि ये जो IMF और World Bank चलती हैं उसके बारे में हमें समझना चाहिये कि अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक के लिये वो कभी शर्ते नहीं लगाते जो संसार के दूसरी या तीसरी दुनिया के देशों पर वो लगाते हैं तो उसका इतिहास बिल्कुल स्पष्ट यह बताता है कि ये बना कैसे,World Bank  और IMF दरअसल द्वितीय विश्वयुध्द में यूरोप और अमरीकी अर्थ-व्यवस्था तबाह (नष्ट) हो गई थी यूरोप को कुछ अधिक हानि हुई थी अमेरिका को कुछ कम, तो यूरोप और अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था जो द्वितीय विश्वयुध्द में नष्ट हुई तो उस अर्थ-व्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिये दो इंस्टीटयूट का जन्म हुआ World Bank और IMF के नाम पर Brettenwood नाम की एक जगह है, अमेरिका में एक गाँव जैसा है अभी वो थोड़ा बड़ा नगर हो गया है वहाँ पर एक संधि हुई थी जिसमें 44 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुये थे, उन लोगों ने एक संधि किया था जिसका नाम है 'Brettenwood संधि तो उस 'Brettenwood संधि के आधार पर World Bank और IMF का जन्म हुआ, द्वितीय विश्वयुध्द के बाद और जब से ये IMF और World Bank का जन्म हुआ है तब से वहाँ एक नीति चलती है, नीति ये चलती है कि IMF और World Bank में जो सदस्य देश हैं वो बिल्कुल लोकतांत्रिक नहीं हैं One Member One Vote कभी नहीं होता IMF में, और ना World Bank में होता है वहाँ अमेरिका के पास सबसे अधिक वोट हैं और अमेरिका का जो Voting share है IMF में और World Bank में भी वो करीब 20% है माने यदि अमेरिका यदि 1 वोट डालता है और उसकी जो कीमत है अगर कुल वोट की कीमत यदि 100 रुपया मानी जाये तो अमेरिका के वोट की कीमत 20 रुपये के बराबर होती है बाकी 80 रुपया की कीमत में दुनियो के सारे देश हैं और वो सारे देश की संख्या लगभग 117 है और IMF और World Bank में कभी भी लोकतंत्र आ नहीं पाया है और आने वाला भी नहीं है क्योंकि वो हमेशा से ढाँचा वैसा ही बनाकर रखना चाहते हैं। 
ये जो World Bank बना था वो इसलिये बना था ताकि दुनिया के तमाम देश युध्द के बाद द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जब  कम अवधी ऋण (शार्ट टर्म लोन) की आवश्यकता पड़े तात्कालिक कोई पेमेण्ट की आवश्यकता पड़े तो बैलेंस आफ पेमेंट की क्राईसेस हो जाये तो IMF उसके लिये कर्ज बाँटेगा और किसी देश को यदि इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट के लिये यदि लोन की आवश्यकता पड़े तो World Bank उसको बाँटेगा, तो इस तरह से बँटवारा हुआ था और उसमें एक महत्वपूर्ण बात है जो मुझे इन संस्थाओं का अध्ययन करने के बाद पता चली जो सामान्य लोगों को मालूम नहीं होती है IMF और World Bank जुड़वा कह सकते हैं एक दूसरे का, और इसमें होता क्या है कि यदि कोई देश World Bank से कर्जा लेने के लिये जाये तो World Bank की तरफ से यह कहा जाता है कि आप IMF की शर्तो को पूरा करिये, माने Cross conditionality की व्यवस्था चलती है और उसमें होता क्या है परोक्ष रूप से वो दोनो शर्ते वो लागू करवा देते हैं इन निर्धन देशों के ऊपर, और मैं कहना ये चाहता हूँ कि World Bank और IMF के तरफ से दी गई शर्ते या उसकी तरफ से दिये गये प्रिसिक्रप्शन कभी रिफार्म नहीं हो सकते ये रिफार्म शब्द का अपमान है ये World Bank और IMF बने ही हैं अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक की Hegemony को बनाये रखने के लिये।
 
भारतीयों से क्या गलती हुई?
हमारे यहाँ क्या त्रुटि हुई पिछले 7 वर्षो में हमारे यहाँ प्रेस ने विशेषकर अंग्रेजी प्रेस ने IMF और World Bank के प्रिसिक्रप्शन को रिफार्म के नाम पर प्रचारित करना शुरु कर दिया और IMF और World Bank की शर्तो को Globalization के रूप में प्रचार करना शुरु कर दिया। Globalization एक बहुत बड़ा व्यापक शब्द है और IMF और World Bank की शर्त बहुत छोटा शब्द है। तो हमसे जो त्रुटि हुई है पिछले 7 वर्षो में विशेषकर इस देश के Intellectual Class से सबसे बड़ी त्रुटि ये हुई कि IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश ने रिफार्म मानने की बड़ी भारी भूल की और IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश में New economy Policy के रूप में प्रचारित किया गया उसमें सरकार की हिस्सेदारी तो है ही, सरकार से अधिक इस देश में मीडिया की जिम्मेदारी थी। इन्हें इस देश के लोगों को साफ-साफ बताना चाहिये था कि इस देश में जो कुछ हो रहा है वो विश्व बैंक और IMF की शर्तो के कारण हो रहा है उसमें भारत सरकार अपनी इच्छा से शामिल है इस पर संदेह था। 

भारत अर्थव्यवस्था का ईतिहास

हमारे इस देश मे कोई आजादी आई नहीं ,यह देश आज भी उतना ही गुलाम है जितना कभी अंग्रेजो के समाने मे था, बल्की आज तो पहले से भी जादा हमारा देश गुलाम हैं । देश की व्यवस्थायें अंग्रेजो के जमाने से जादा गुलाम हैं । ब्रिटिश संसद मे १८१३ मे बहस चल रही है के भारत को गुलाम बनाने के लियें भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना हैं इसके लिये भारत के व्यापारीयोंओं को बर्बाद करना होगा । यदि भारत के व्यापारी बर्बाद हो जयेंगें तो ईस्ट ईन्डीया की कम्पनी का माल इस देश मे बिकने लगेगा । इस बहस मे एक अंग्रेज अधीकारी बीलव्र फोर्स क्या कहता हैं कि हमे भारत मे फ्री ट्रेड करना हैं । फ्री ट्रेड का मतलब "ब्रिटीश उत्पादो का भारत के गांव - गांव मे बिकना, ब्रिटीश उत्पादो का भारत के बाजार मे भर जाना और भारतवासीयों द्वारा जादा से जादा ब्रिटीश उत्पादो का उपभोग करना " और इसके दुसरे भाग में बीलव्र फोर्स कह रहा है कि "भारत मे बहुत अच्छा कंचा माल है जो सरा का सरा ब्रिटेन मे आयें जिस पर हमें एक पैसा भी खर्च ना करना पडे और उस माल को ब्रिटेन मे तैयार करके भारत के बाजारो मे बेचना और ब्रिटिश के माल पर कोई टेक्स नही लगेगा, यह हैं फ्री ट्रेड । यह फ्री ट्रेड आज भी भारत मे चलाया जा रहा हैं ग्लोबलीजेशन और लिब्रललीजेशन के नाम पर, जो १८१३ मे भी अंग्रेजो द्वारा चलाया गया था इस देश मे यहां की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लियें तो इसमे नया क्या हैं । तो १८१३में ईस्ट ईंन्डीया कम्पनी की सरकार फ्री ट्रेड के लियें अलग - अलग पोल्सियां बन रही है और वो पोल्सियां क्या है ? सब से पहली पोल्सी हैं कि ब्रिटिश माल पर कोई टेक्स नहीं लगेगा और भारतीये माल पर अधिक से अधिक टेक्स लगाया जाए । परिणाम क्या निकलेगा कि ब्रिटेन का माल सस्ता हो जाएगा और भारतीयें माल महंगा हो जायेंगा । ताकी ब्रेटेन का माल भारत के गांव -गांव मे बिके और भारत के व्यापारीयों का माल नही बिकेगा और भारत के व्यापारी बर्बाद हो जायेंगें । और भारत के व्यापारी बर्बाद हो गए तो भारत कि अर्थव्यवस्था भी बर्बाद हो जायेंगी । ब्रिटेन के माल पर को टेक्स नहीं और नाही कोई आयात टेक्स भी नहीं लगेगा । तो इस के लियें वह भारत में विभीन्न कानून बना रहे है इस देश में ताकी इस देश को बर्बाद किया जा सके । इसके लिये भारतवासीयों पर जो माल बना रहे है सबसे पहला टेक्स लगाया गया सेंट्राल एक्साईज एण्ड सोल्ट टेक्स ( वस्तूओ के उत्पादान पर टेक्स) जो भारत के लोग उत्पादन कर रहे है उस पर टेक्स लगाया । और वो लोग जब उन वस्तूओं को बाजार मे बेचने जाते है तो उसपर भी टेक्स (सेल्स टेक्स) और अब जो माल बैचने से जो आमनदनी हूई है उस पर भी टेक्स लगा दिया आयेकर ( ईन्काम टेक्स) । तथा वस्तूओं के लाने ले जाने पर भी एक टेक्स लगा दिया ऑक्ट्रोये टेक्स (चूंगी नाका टेक्स) तथा ईस्ट ईण्डीया कि कम्पनी भारत में कोई पुल बना देते थे तो उस पूल पर से कोई गाडी जायें तो उस पर भी टोल टेक्स। इस प्रकार के पांचो टेक्स अंग्रेज लगा रहे हैं ताकी भारतीयां व्यापारीयोंओं को बर्बाद कर सकें । और आप को यह जान कार अश्चर्यी होगा की यह पांचो के पांचों टेक्स आज भी इस देश मे ही चल रहे है । अंग्रेजों ने तो समझ मे आता हैं की भारत को बर्बाद करने के लियें यह टेक्स लगायें थे । कूल मिलाकर इन पांचो टेक्सों को देखें तो १०० रू कि वस्तू पर १२७ रु का टेक्स देना पड रहा था । अब भारतीयें व्यापारीओं का माल महंगा होगया और दुसरी तरफ ब्रिटीश माल पर सभी प्रकार के टेक्सों को हटा दिया गया ताकी ब्रिटीश माल सस्ता हो जायें और गांव - गांव मे उनका माल बिके । जब १०० रु की वस्तू पर १२७ रु देने पडे तो वह व्यापारी बर्बाद हो जाएगा मर जाएगा या तो वोह व्यापारी बईमान बन जायेंगा तो दोनो ही तरफ से लडू अंग्रेजो के हाथ मे है कयोकी व्यापारी बईमान बना तो , बईमान व्यक्ति कभी आंख मिलाकर बात नही कर सकता तो यो हमारा गुलाम बन जयेंगा या बर्बाद हो गाया तो भी वो हमारा गुलाम बन जायेंगा । तो व्यापारी किस प्रकार बर्बाद हुयें यह समझ मे आ गया होगा । अंग्रेजों ने इस देश मे टेक्सेशन का सीस्टाम क्यों लायें इस देश के व्यापारीओं को बईमान बनाने के लिए कि वो टेक्स कि चोरी करें या बर्बाद हो जाए । इस के लियें उन्होने अलग- अलग विभाग भी बनाए,सेंट्राल एक्साईज विभाग, सेल्स टेक्स विभाग, ईन्काम टेक्स विभाग,ऑक्ट्रोये टेक्स विभाग और टोल टेक्स विभाग । जो आज भी चल रहे हैं । आप ध्यान से सोचे कि अंग्रेज तो इस देश को बर्बाद करना चाहते थे इसलिए टेक्सेशन का सीस्टाम लयें परन्तू आज भी वही टेक्सेशन का सीस्टाम चल रहा है क्यों ? अंग्रेजों ने ईन्काम टेक्स लगाया तो कितना लगाया ९७% टेक्स । मतलब १०० रू पर ९७ रु टेक्स आप को केवल ३ रू ही मिलेंगें । और आप को यह जान कर अश्चर्यी होगा की देश आजाद हुआ १९४७ को और तब भी इस देश मे टेक्स ९७% ही लगता रहा १९७१-७२ तक क्यों ? परन्तू आजाद होने के बाद भी हमरी सरकार इन टेक्सो को क्यों लगा रही हैं ? बल्की आज तो और भी कई और नये टेक्स लगा दियें गयें हैं । यदि विदेशी देशो में एक से दो प्रकार के टेक्स ही लगायें जाते है जबकी भारत मे ६४ प्रकार के अप्रत्याक्ष वं एक परोक्ष टेक्स लगाए जाते है । मान लीजियें १०० रुपये के वस्तू पर कूल टेस्क को जोडा जाये तो ६५% तो टेक्स ही देना पड्ता है यानि १०० रु की वस्तू १६५ रु मे मिलेगी । डब्लू.टी.औ. कुल १२४ देशो में लागू है २००५ के राजीव भाई के व्याख्यां में बता रहें है एक देश हैं अमेरीका किस पर पछ्ले २० वर्षो से संसाद मे बहस चल रही हैं परन्त वह वैट टेक्स नहीं ला रहे आपने देश में और उनमें से १२३ देश एसे हैं जिनदेशों मे वैट टेक्स तो लागू हुआ परन्तू एक भी अप्रत्याक्ष टेक्स नहीं हैं इस देश में और हमारे देश मे १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उस्में वैट १५वां टेक्स और आ गया हैं ब्राजील मे संसाद मे और संसाद के बाहर २० वर्षो तक बहस की लोगों ने व्यापरियों ने और सुझाव दियें सुके अनूसार वैट टेक्स आया और वैट टेक्स आने से पहले सारे के सारे अप्रत्यक्ष टेक्सों को समाप्त किया फिर वैट टेक्स आया और भारत में उस पर कोई बहस नही हूई उसे हस्ताक्षर करने से पहले और जिन मत्रीयों ने यह वैट लाया उन्हों ने भी इसे लाने से पहले नहीं पडा । जर्मनी मे भी १२-१५वर्षॉं तक बहस चली । मुख्य बात जो कहना चाहता हू वो यह कि सभी १२३ देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स आया हैं वहॉ पर कोई भी अप्रत्यक्ष टेक्स नहीं हैं और उनमें से २३ देश तो एसे है जिनमें प्रत्यक्ष टेक्स भी नहीं हैं केवल एक ही टेक्स हैं वैट टेक्स । उदहारण के रुप में स्वीजार्लेण्ड में एक ही टेक्स हैं वैटे टेक्स वहॉ पर इनकम टेक्स भी नही सेल्स टेक्स भी नहीं कोई दुसरा टेक्स नहीं । और उदहारण दूं लग्ज्मबर्ग एक देश है, पनामा एक देश है एसे २३ देश हैं दुनियां में जिनमें वैट के अलावा कोई दुसरा टेक्स नहीं हैं ८४ देश एसे हैं दुनियां में जहॉ पर दो टेक्स हैं एक इनकम टेक्स और दुसरा वैट टेक्स हैं । अब भारत की बात करें । भारत में एक प्रत्यक्ष टेक्स हैं और १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उपर से वैट टेक्स भी क्यों ? जिदेशो में प्रत्यक्ष टेक्स और अप्रत्यक्ष टेक्स दोनो समाप्त हो गयें और केवल एक ही टेक्स रह गया तो उनके तो मजे हो गए परन्तू भारत में ? अब आपको पता चले की जिन देशो में इन सारे टेक्सों को हटा कर वैट टेक्स लाया उस वैट टेक्स की दर भारत के वैट टेक्स की तुलना मे कम हैं तो ? और वहॉ पर वैट टेक्स भी सभी वसतूओं पर नहीं है । और एक बात बडी महत्व की हैं सभी वैट टेक्स वाले देशो में एक कानून हैं "क्सटोडीयान कानून" इस मतलब सरकार टेक्स की मालीक नहीं हैं वह केवल क्सटोडीयान हैं उस टेक्स के पैसे को देश के विकास में लागा सकती हैं या सम्भाल के रख सकती हैं इसका मतलाब उस पैसे की मालीक नहीं हैं मालीक तो टेक्स भरने वाला हैं जब उसे पैसे की अवश्यकता हो तो सरकार को सारा पैसा अपको देगीं । मान लिजियें कि यदि आप जर्मन मे रह रहें हैं और आपने २१ वर्षो तक वैट टेक्स भरा और उसके बाद आप उस देश को छोड कर दुसरे देश हमेशा के लियें जाना चाहते हैं तो सरकार आप की टेक्स एक -एक पैसा आप को उसी दिन आप को देगी और आपको एक धन्यावाद पत्र भी देगी । इस प्रकार का नियम है सभी देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स लिया जाता है भारत को छोड कर । और एक बात यदि कोई भूक्कांप आ गया या बाड आगई तो आप का सब दूकान मकांन बर्बाद हो गया तो भी सरकार आप का सारा टेक्स आप को देगी और अगले तीन वर्षो तक आप से कोई टेक्स नही लेगी । भारत मे एसा कोई नियम नहीं हैं और एसी सम्भावना भी नहीं हैं भारत को छोड कर सभी देशो वैट वाले देशो में यह नियम है सिन्गल पोईन्ट वैट हैं और भारत मे मलटी पोईन्ट वैट है (मतलब एक वस्तू पर एक ही बार वैट टेक्स लगेगा ) और नियम है वैट टेक्स सेन्ट्रालाईज केन्द्र सरकार द्वारा है जबकी भारत में वैट टेक्स राज्य स्तर पर लगता है तो अलग राज्य तो मे अलग नियम तो बहुत समस्या होती है वैट को लेकर यदि वस्तू एक राज्य से दुसरे राज्य में जायें तो । एक और नियम हैं  वैट टेक्स कि दर बहूत कम हैं भारत कि तूलना में । और एक बात जो टेक्स अधीकारी होता हैं  उसे कोई जूडीशीयल अधीकार नही होता हैं (मतलब आपको जेल भेजने का अधिकार या आपकी सम्पति को जब्त करके उसकी निलामी करने का अधिकार एसा कोई भी अधिकार टेक्स के किसी भी अधिकारी को नही हैं ।) भारत मे एक और वैट टेक्स मे डाला गया हैं की सभी अंतराष्ट्रीयां संस्था प्रोफीटेव्ल और नोन प्रोफीटेव्ल पर कोई वैट टेक्स नहीं लगेगा । इसका मतलब सभी चर्च अब टेक्स से बहार होंगें और सभी मंदिरों पर अब टेक्स लगेगां क्यों ?हमारे देश मे शराब पर वैट टेक्स नहीं है और लाट्रीओं पर टेक्स नहीं हैं परन्तू दूध पर वैट टेक्स हैं नमक पर वैट टेक्स हैं  मतलब सरकार चाहती हैं की हम शराब पियें दूध को छोड कर । मैं कैसे यह मानू की यह देश अजाद हो गया हैं ।


अंग्रेजों की संसाद में एक बहस चल रही है कि भारत का कुल व्यापार कितना है ? तो इस का जवाब विलीयम एडम भारत के कई रेवेनू के अधिकारियों कि मद्द से सर्वे करने के बाद देता है कि भारत का कुल व्यापार १८३५-५० तक १/३ प्रतिशत था , या दुसरी तरह से कहें के  सारी दुनियां का कुल ट्रेड मान लिजियें की १०० बिलीयान डालार हो तो उस समय केवल भारत का ट्रेड ३३बिलीयान डालार था या तीसरी तरह से कहें तो भारत का कुल निर्यात दुनियां के कुल निर्यात का ३३% था । जब्कि उस समय भारत में कोई बडा प्रोजेक्ट नहीं था और ना ही इतने ईन्वेश्मेंटर थे । वो भी तब जब अंग्रेज भारत को बर्बाद करने पर तुले हूए थे ।  आज क्या स्तिति है ? आज भारत का कुल उत्पाद दुनिया  के कुल उत्पाद का ०.०१ प्रतिशत हैं । तो हम विकास कर रहे है या विनाश की और बड रहे हैं जरा सोचीयें ।


तो जरा सोचो के भारत पर जब कोई टेक्स नही लगा था तब तक भारत ३३% का उत्पादन करता था और आज भारतीयों पर टेक्स लगा -लगा कर बर्बाद कर दिया है आजादी के बाद भी हमारा खुन चूसा जा रहा हैं टेक्सो के द्वारा हमे आज भी बईमान बनाया जा रहा है ताकि हम गलत बात का विरोध ना कर सकें और वो अपनी मन्शाओं को पुरा करते रहें । 


विलीयम एडम के सर्वे के अनुसार १८३५-५० तक भारत में स्टील बनाने वाली १०००० फेक्ट्रीयां थी ।  भारत कि उन १०००० स्टील की फेक्ट्रीयांओं से कुल स्टील का उत्पादन ८० से ९० लाख टंन होता था सन १८३५-५० तक और आज भारत में इतने बडे - बडे स्टील पलान्ट, इतनी मशीनें , इतने विदेशी कम्पनियां और इतने सारे स्टील के फेक्ट्रीयां परन्तू कुल उत्पादन ७० से ७५ लाख टंन प्रति वर्ष था । उनमे जो स्टील बन रहा था उसकी गुणवता (कूवालीटी ) क्या थी ?  उस पर वर्षो -वर्ष जंग नहीं लगता था इतना बडीयां गुण्वत्ता का स्टील भारत में बनता रहा १८३५-५० तक । जिसका जीवांत उदाहरण हैं मेहरोली में लोहे का अशोक स्तम्भ । और आज का स्टील यदि वर्षा के पानी में छोड दें तो ३ महीने में ही लोहे पर जंग लग जायेंगा । और यह स्टील कि सबसे अधिक फेक्ट्रीयां सर्गूजा मध्य प्रदेश मे है क्यों की दूनियां का सबसे अच्छा आईरन ऑर सबसे अधिक मात्रा में भारत के सर्गूजा में पाया जाता हैं, और जो इस तकनिक को जानते है उन्हे हम आदिवासी कहते हैं उन के पास कोई डीग्री नहीं है परन्तू वह सबसे अच्छा स्टील बनाने की कला जानते हैं परन्तू हम मनते हैं कि जिसके पास कोई डीग्री नहीं हैं वो अशिक्षीत हैं ,मुर्ख हैं । जबकी उनके पास सबसे उत्तम तकनीक हैं जो आज धीरे -धीरे   लूप्त होती जा रही है हमरी गलती के कारण । अंग्रेजों ने इस कला को बर्बाद करने के लिये भी एक कानून ( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट)  बनाया था जिसके अनूसार स्थानीयें आदीवासीओं को लोहे से अच्छी स्टील बनाना जानते थे उन्हे खादानो से कंचा माल नही लेने देते थे । यदि वह खदानों से कचा माल लें तो उनको ४० कोडे मारे जाते थे और उस पर भी यदि वह व्यक्ति नहीं मरे तो उसको गोली मार दी जाती थी इसना सख्त कानून बना दिया ।  तो बीना कचां माल के वह लोग भूखे मरने लगे । और उन्हीं  खदानों से अंग्रेज लोहा खोद - खोद कर ले जाते थे । और स्टील की विभिन्न वस्तूएं बनाकर हमरे बाजारो में बेचा करते थे । आज भी वोही कानून( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट) चल रहा है भारत के मूल निवासी (आदिवासी) लोहा नही ले जा सकते । जबकी जापान कि काम्पनी निपन्डेरनू  (एसी ही और भी विदेशी कम्पनियां) । आज भी कचा माल कोडीयों केदाम खोद - खोद कर ले जा रही है और स्टील बनाकर हमे ही उंच्चे दामॉ पर बेच रही हैं ।  आज भी सर्गुजा मे कुछ आदिवासी लोग हैं जो उस तकनीक को जानते है परन्तू उनको आज भी उसी कानून के कारण स्टील नही लेने दिया जाता । तो हम कैसे अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारे जब हमे ही हमारा कचां माल नही लेने दिया जाता और विदेशी कम्पनियों को कोडीयों के दाम पर कचां माल खोद-खोद करे लें जा रही हैं । और क्यों कोई राजनितिक पार्टी , भारत देश के लोग इस पर विचार नही मरते । क्यों नहीं इस कानून को रद्द किया जाता हैं । कैसे में मानू के यह देश आजाद हो गया ?
अशोक स्तम्भ
भारत में बहुत अच्छा कपडा बनाने वाले बडीयां कारीगर होते था वो कपडा इतना बारीक बुनाई करते थे की कोई मशीन भी नहीं कर सकती । उस कपडे के थान के थान एक छोटी सी अंगूठी में से निकल जाते थे । पूरी दुनियां मे प्रसिध्द था भारत का कपडा १८३५-५० तक । भारत मे उस समय तक दो ही वस्तूएं सबसे जादा निर्यात होती थी कपडा और मसाले । अंग्रेजो का कपडा लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा बिक नही पाता था क्योंकी भारत का ही कपडा इतना बडीयां होता था । तो फ्री ट्रेड के नाम पर अंग्रेजों ने उन सब करीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें  । सुरत में १००००० बहतरीन कारीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें । बिहार मे एक इलाका हैं मधूबनी । मधूबनी मे २५०००० से ३००००० कारीगरों के हाथ कटवा दियें अंग्रेजों ने । इस पर अंग्रेज बडा गर्व करते है, कयोकी भारत का सबसे बडा उद्योग हैं कपडा मील्ले और कारीगर नही रहेंगे तो कपडा मील्ले नही चल सकती और जब कपडा मील्ले धराशाही होगी तो भारत की अर्थव्यवस्था भी धराशाही हो जाएगी । यह एक वार्ता हैं ब्रिटीश की संसाद मे चल रही हैं । और उसके बाद अंग्रेजों ने यह कर दिया हैं  ताकी अंग्रेजो का माल (लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा ) भारत मे बिक पायें । और अंग्रेजों ने अपने कपडों पर से सारे टेक्स हटा लियें और भारत की कपडा मील्लों पर अतीरीक्त टेक्स लगाया । सुरत की कपडा मील्लों पर १०००% अतीरिक्त टेक्स लगा दिया । 
ताकी यह उद्योग बन्द हो जायें । और लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा  बिकने लगे ।

अब कपडा बनाने के लियें कच्चा माल अंग्रेजों को चाहीयें तो भारत का कोटन ब्रिटेन मे जाने लगा । तो अंग्रेजों को बडा परीशाम करना पडता था तो अंग्रेजों ने जहां - जहा पर अच्छे कोटन (कच्चा माल) मिलता था वहां - वहां पर अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लियें रेलगाडी चलाई इस देश में । आपको लगता होगा कि अंग्रेज नही आते तो रेलगाडी नही होती इस देश में परन्तू आप यह नही जानते की अंग्रेजो ने रेल इस लियें चलाई ताकी अंग्रेजे भारत के गांव - गांव से कोटन को ईकाठा करके मुम्बाई ले जा सके और मुम्बाई के बन्द्रगाह से जहाजॐ के द्वारा कोटन को ब्रिटेन ले जा सके । और बाद में इसी रेल  का एक और प्रयोग होने लगा । अंदोलन को कुचलने के लियें जल्दी से जल्दी भारत के विभिन्न क्षेत्रो मे सेना को पहुंचाने के लिए रेल का प्रयोग भी किया जाने लगा ।  अंग्रेजों के सबसे पहले रेल जो चलाई है मुम्बाई से थाना के बीच में ट्राईल के रुप में । जब बाद मे प्रयोग सफल हो गया तो सबसे पहले अंग्रेजों ने रेल चलाई है मुम्बाई से अहमदाबाद मे बीच में जो कपास के लिये सबसे अच्छा उत्पादान करते हैं ।  अब अंग्रेजों के कपास को ईकाठा कर के मुम्बाई के बंद्र्गाह से कपास के जहाज तो भर कर भेजना शुरु कर दियें परन्तू इंग्लेंड से खाली जहाज आते थे तो खाली जहाज समून्द्र में डुब जाते थे । तो इसके लियें उन्हो ने समून्द्री जहाजों में नमक भर कर भेजना शुरु कर दिया । समून्द्री जहाजों में नमक भर कर ईंग्लेंड से आते थे और मुम्बाई के बन्द्रगाह पर नमक डाल देते थे । और यहां से कपास भर कर ले जाते थे । भारत में उस समय तक सभी लोग स्वादेशी नमक ही खाते थे । परन्तू अग्रेजों ने स्वदेशी नमक पर भी टेक्स लगा दियें और अपना नमक टेक्स फ्री बेचने लगें ताकी सभी उनका नमक खाएं । इस पर महात्मा गांधी जी ने डांडी सत्यग्रह किया । ६ अप्रेल १९३० में महात्मा गांघी जी ने एक मूठ्ठी हाथ मे लेकर कसम खाई थी के भारत में विदेशी नमक नहीं बिकने दूंगा । और आज भारत में कितने ही विदेशी नमक बिक रहे हैं पत्ता नहीं गांघी जी कि आत्मा को कितना दुःख होता होगा यह देख कर । हमारी सरकारो ने विदेशी कम्पनियों को नमक बनाने के लियें भी अनूमती दे दी । जरा आप बातायें कि नमक बनाने मे कॉन सी हाईटेक तकनीक हैं । समून्द्र का पानी एक जगह ईकाठा कर लेते हैं और धूप में  पानी भाप बन कर ऊड जाता हैं और नमक नीचे रह जाता हैं क्या भारत के लोग इतना भी नहीं कर सकते हैं । कि विदेशी कम्पनियाओं को नमक बनाने के लिये अनूमती दे दी । गांधीजी कि आत्मा कितने आंसू बाहाती होगी यह देख कर कि जिस देश मे मेने नमक सत्यग्रह किया वहां पर आजादी के बाद भी आज तक विदेशी नमक बिक रहा हैं जरा सोचीयें कि यह कितना बडा नेशनल क्राईम हैं । अंग्रेजों ने जो - जो व्यवस्थायें बनाई सभी इस देश मे आज भी चल रही हैं । तो मैं यह कैसे मानू की यह देश आजाद हो चूका हैं ।