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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

शादीशुदा जोड़ो के लिए परिवार नियोजन उपाय By: Rajiv Dixit Ji

बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी जरूर पढ़ें !
मित्रो हमारे बच्चे स्‍वस्थ हों, तन्दरुस्त हों, मेधावी हों, उनके जीवन मे इंटेलिजेन्सी हमेशा हो, | Q अच्छा रहे, समाज का काम करें, इनके लिए क्या करें:
इनका उपाय निम्नलिखित है:
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1. किसी भी माँ या पिता को अपने जीवन मे सबसे अच्छा बच्चा चाहिए तो उनका नियोजन करना पड़ेगा.
– बिना नियोजन के बच्चे दाऊद इब्राहिम होते हैं. माता बहन को पीटते हैं.
– हम हर चीज़ के लिए नियोजन करते हैं, घर बनाने के लिए, आदि, ऐसे ही बच्चे के लिए भी नियोजन करिए.
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– नियोजन मे क्या करना होगा? सबसे पहला नियोजन संयम पालना पड़ेगा. ज़्यादा समय ब्रह्मचर्या का पालन करना. स्त्री के लिए संयम रखना बहुत सरल है, पुरुषों के लिए कठिन है. साल मे एक या 2 बार ही संसर्ग करें, या फिर महीने मे बस एक बार ही पत्नी के साथ समागम हो. इसके लिए संकल्प मजबूत रहना चाहिए, और वो मजबूत करने के लिए अदरक काम आएगा, अदरक मुँह मे रख कर चूसते रहें. ये अदरक हर तरह का संकल्प मजबूत करने मे सहायता करता है.
2. नियमित रूप से जीवन मे चूना का सेवन करना, दोनो स्त्री पुरुष चूना खाएँ.
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– चूना 1 व्यक्ति दिन मे बस 1 ग्राम तक ही खाए, दूध छोड़ कर किसी भी तरल पदार्थ मे घोल कर पीना है, पान वाला चूना. जैसे पानी, दही, जूस दाल आदि.
नोट: पथरी के रोगी के लिए चूना वर्जित है.
3. ख़ान पान का ध्यान रखना.
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– राणा प्रताप, शिवा जी जैसे बच्चे चाहिए तो सात्विक भोजन करें स्त्री पुरुष. माँस, मछ्ली, अंडा, शराब सिगरेट सब वर्जित. शाकाहारी जीवन.
– शाकाहारी भोजन मे कुछ चीज़ें अवश्य हों, जैसे देशी गाय का दूध, दही, मक्खन, घी, ये सब अधिक उपयोग करना. मक्खन के साथ मिश्री ज़रूर खाएँ नियमित रूप से. मात्रा: 25 ग्राम मक्खन के साथ 10 ग्राम मिश्री.
– तिल, मूँग की दाल, मसूर की दाल, सीज़न वाले फल, जैसे गर्मी मे आम. नियमित रूप से खाना है ये सब
– फल कभी भी भोजन के साथ नही खाना अलग से खाना फल. खाने के 2-3 घंटे बाद फल खाना, या फिर सुबहा फल का ही नाश्ता करें, रात मे फल नही खाना.
4. शारीरिक श्रम नियमित रूप से करें दोनो पति पत्नी.
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– शारीरिक श्रम करें दोनो पति पत्नी. महिलाएँ ऐसा श्रम करें जिसमे गर्भाशय का मूव्मेंट हो. चटनी बनाना, कपड़े धोना, रोटी बनाना, ये सब काम हाथ से ही करें. चाकी चलाना सबसे अच्छा है, दिन मे बस 15 मिनिट. सबसे अच्छी संतान होगी.
– पुरुषों के लिए शरीर श्रम: नागर चलाना, नागार नही चला सकते तो, सीढ़ियाँ चढ़ना और उतरना. या फिर ज़्यादा पैदल चलना.
5. संतान का रंग साफ पाने के लिए.
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– वैसे तो व्यक्ति को उसके कर्मो से जानना चाहिए रंग रूप से नहीं !फिर भी जो लोग अपनी संतान का रंग साफ चाहते हैं, वो दोनो पति पत्नी हल्दी का दूध पीएँ, रात्रि को दूध मे हल्दी मिला कर पीएँ, संतान का रंग दोनो माता पिता से साफ होगा.
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6. संतान खूब तेज बुद्धि वाली हो इसके लिए:
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– दही चूना मिला कर खाते रहना; देशी गाय का दूध लो, उसका दही जमाना चाँदी के बर्तन मे सुबह खाली पेट उसमे चूना मिला कर खाना, दोनो पति पत्नी. चूना वैसे ही लेना है प्रति व्यक्ति 1 ग्राम या गेहू के 1 दाने के बराबर. नोट: पथरी के रोगियों के लिए चूना वर्जित है ध्यान रहे.
7. तेजस्वी संताप प्राप्ति हेतु समागम करने के लिए आदर्श दिन:
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– पत्नी का मासिक शुरू होने वाले दिन से 10 दिन बाद और 18 दिन पहले, इस बीच का जो 7 दिन है वो संतान प्राप्ति के लिए सबसे अच्छा समय है. तेजस्वी और गुणी संतान होगी.
– इसमे 2 तरह के दिन आएँगे सम और विशॅम; जैसे 10 सम, 11 विषम, 12 सम, 13 विषम…. आदि; यदि सम दिन मे समागम करेंगे तो 99% पुत्र होगा, और विषम वाले दिन संसर्ग करेंगे तो पुत्री होगी. महिलाओं मे X और X गुण सूत्र होते हैं, और पुरुषों मे X और Y होते हैं, सम वाले दिन, Y अधिक सक्रिय हो जाता है, तब Y और X मिल कर पुत्र होते हैं, विषम दिन X सक्रिय होता है तो X और X मिल कर पुत्री होती है.
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8. शुकलपक्ष के दिनो मे समागम करने से पुत्र या पुत्री 99% प्रतापी, तेजस्वी, लड़ने भिड़ने वाले होंगे, कृष्नपक्ष मे अच्छे साहित्यकार, वैग्यानिक, डॉक्टर्स, इंजिनीयर्स, सीए होंगे.
– छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप, भगत सिंग, उधम सिंग, आज़ाद. ये सब शुकलपक्ष वाले हैं. शुकलपक्ष माने चंद्रमा लगातार बढ़ता हुआ होता है.
– न्यूटेन, गगदीश चंद्रा खुराना, जगदीश चंद्र बोस आदि, सब कृष्नपक्ष वाले हैं.
– चंद्रमा के शरीर पर पड़ने वाली ऊर्जा का सब चक्कर है, आप जानते हैं कृष्णपाक्ष मे चंद्रमा नही होता और शुकलपक्ष मे चंद्रमा बहुत तीव्र होता है. चंद्रमा का प्रकाश अपना नही है. वो सूर्य से आता है, शुकलपक्ष मे सूर्य की तीव्रता है, तो सूर्य का तेज आता है संतानों मे.
– कृष्णपाक्ष मे सूर्य का प्रताप नही है तो वो दिमाग़ वाली संतान होंगी.
– अगर आप 2 बच्चे कर रहे हैं तो इस प्रकार नियोजन करें की एक संतान शुकलपक्ष की और एक संतान कृष्णपाक्ष की.
9. मंदबुद्धि बच्चे कहाँ से आते हैं?
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– ये बच्चे उन माता पिता के हैं जिनके शरीर मे कॅल्षियम बहुत कम है. इनके बच्चे मतिमन्द होने ही वाले हैं, विकलांग होने ही वाले हैं. कॅल्षियम का टेस्ट होता है, पेतॉलजी मे हो जाएगा. सस्ते मे हो जाता है कॅल्षियम टेस्ट शरीर का. चुना कैल्शियम का सबसे अच्छा स्त्रोत है !
– महाराष्ट्र मे कोंकण बेल्ट के बच्चे खूब तेज बुद्धि वाले होते हैं, उनकी आँखे भी दुनिया मे सबसे सुंदर होती हैं. आई क्यू सबसे अधिक होता है उनका, वहाँ की मिट्टी लाल है, हर अनाज और फल मे कॅल्षियम और आइरन अधिक होता है. लाल मिट्टी मे भरपूर कॅल्षियम और आइरन है.
गर्भवती माता को आध्यात्मिक,ज्ञान वाली किताबें पढ़नी चाहिए ! बच्चा का उस पर प्रभाव होता है ! कहा जाता है अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने गर्भ मे चक्रव्यू भेदने की विधि सीखी थी !!
– नाड़ी और गोत्र का मिलान होता है ताकि ‘डी एन ए’ एक ना हो. प्रेम विवाह भी करें तो इन बातों का ध्यान रखें, नही तो प्रेम छूट जाएगा और विवाह घिसट घिसट कर चलेगा. डोपमाइन केमिकल के प्रभाव से प्रेम भाव उत्पन्न होता है, वो शीघ्र ही समाप्त हो जाता है.
10. पति पत्नी का ब्लड ग्रूप अलग रहे तो अच्छा.
11. पति पत्नी सर्वदा दक्षिण दिशा मे सिर करके सोएँ.
12. यदि गर्भाधान हो गया तो अब क्या करें? उपरोक्त जानकारी के बिना | ऐसे मे हमे उत्तम संतान प्राप्त हो इसके लिए क्या करें?
– माता का भोजन अच्छा होते ही जाना चाहिए. दूध, ताक, दही, मक्खन, लोनी, छ्छाच्छ भरपूर खाना है. याद रखिए, देशी गोमता का ही. घबराएँ नही वजन नही बढ़ेगा.
– भरपूर कॅल्षियम आपके शरीर मे रहे, मतलब चूना बराबर खाते रहना, केला, मूँगफली दाना, तिल. इन चीज़ों मे भरपूर कॅल्षियम है.
– समय से भोजन समय से आराम. लंच करिए 10 बजे भरपेट, डिन्नर शाम 5-6 बजे, बीच मे भूख लगे तो जूस, फल, मूँगफली दाना, गुड, तिल पट्टी, दही खाना. सुबह शाम भोजन भरपेट.
– पहले महीने से सातवे महीने तक थोड़ा थोड़ा श्रम करते रहें, जाता चलाना, चटनी बनाना, कपड़े धोना, झाड़ू पोंच्छा, सब हाथ से करें, मशीन से नही.
– पहले दिन से 9 महीने, 9 दिन, 9 घंटे तक गर्भवती माता को कोई मानसिक तनाव नही देना नही तो दुष्परिणाम 10 गुना तक बच्चे को मिलेगा.
– गर्भवती माता को जो जो पसंद नही है वो उतने दीनो तक घर मे नही होना चाहिए.
– यदि इन बातों का ध्यान नही दिया तो बच्चा बाहर आकर जिंदगी भर आपको त्रास देगा.
– सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का असर गर्भवती महिला पर होता है, सूर्य ग्रहण बच्चे के लिए बड़ा तकलीफ़ वाला होता है, चंद्र ग्रहण उतना नही होता. सूर्य ग्रहण मे ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ होता है, तो ऐसे मे माता को आराम करना चाहिए और बाहर नही निकलना चाहिए.
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पूरी post पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !
अमर बलिदानी राजीव दीक्षित जी को नमन !
-वन्दे मातरम

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पथरी का आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक इलाज BY RAJIV DIXIT JI

सबसे पहले कुछ परहेज !
मित्रो जिसको भी शरीर मे पथरी है वो चुना कभी ना खाएं ! (काफी लोग पान मे डाल कर खा जाते हैं )
क्योंकि पथरी होने का मुख्य कारण आपके शरीर मे अधिक मात्रा मे कैलशियम का होना है | मतलब जिनके शरीर मे पथरी हुई है उनके शरीर मे जरुरत से अधिक मात्रा मे कैलशियम है लेकिन वो शरीर मे पच नहीं रहा है वो अलग बात हे| इसलिए आप चुना खाना बंद कर दीजिए|
आयुर्वेदिक इलाज !
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पखानबेद नाम का एक पौधा होता है ! उसे पथरचट भी कुछ लोग बोलते है ! उसके 10 पत्तों को 1 से डेड गिलास पानी मे उबाल कर काढ़ा बना ले ! मात्र 7 से 15 दिन मे पूरी पथरी खत्म !! और कई बार तो इससे भी जल्दी खत्म हो जाती !!! आप दिन मे 3 बार पत्ते 3 पत्ते सीधे भी खा सकते हैं !
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होमियोपेथी इलाज !
अब होमियोपेथी मे एक दवा है ! वो आपको किसी भी होमियोपेथी के दुकान पर मिलेगी उसका नाम हे BERBERIS VULGARIS ये दवा के आगे लिखना है MOTHER TINCHER ! ये उसकी पोटेंसी हे|
वो दुकान वाला समझ जायेगा| यह दवा होमियोपेथी की दुकान से ले आइये| (स्वदेशी कंपनी SBL की बढ़िया असर करती है )
(ये BERBERIS VULGARIS दवा भी पथरचट नाम के पोधे से बनी है बस फर्क इतना है ये dilutions form मे हैं पथरचट पोधे का botanical name BERBERIS VULGARIS ही है )
अब इस दवा की 10-15 बूंदों को एक चौथाई (1/ 4) कप गुण गुने पानी मे मिलाकर दिन मे चार बार (सुबह,दोपहर,शाम और रात) लेना है | चार बार अधिक से अधिक और कमसे कम तीन बार|इसको लगातार एक से डेढ़ महीने तक लेना है कभी कभी दो महीने भी लग जाते है |
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इससे जीतने भी stone है ,कही भी हो गोलब्लेडर gall bladder )मे हो या फिर किडनी मे हो,या युनिद्रा के आसपास हो,या फिर मुत्रपिंड मे हो| वो सभी स्टोन को पिगलाकर ये निकाल देता हे|
99% केस मे डेढ़ से दो महीने मे ही सब टूट कर निकाल देता हे कभी कभी हो सकता हे तीन महीने भी हो सकता हे लेना पड़े|तो आप दो महीने बाद सोनोग्राफी करवा लीजिए आपको पता चल जायेगा कितना टूट गया है कितना रह गया है | अगर रह गया हहै तो थोड़े दिन और ले लीजिए|यह दवा का साइड इफेक्ट नहीं है |
और यही दवा से पित की पथरी (gallbladder stones ) भी ठीक हो जाती है ! जिसे आधुनिक डाक्टर पित का कैंसर बोल देते हैं !
ये तो हुआ जब stone टूट के निकल गया अब दोबारा भविष्य मे यह ना बने उसके लिए क्या??? क्योंकि कई लोगो को बार बार पथरी होती है |एक बार stone टूट के निकल गया अब कभी दोबारा नहीं आना चाहिए इसके लिए क्या ???
इसके लिए एक और होमियोपेथी मे दवा है CHINA 1000|
प्रवाही स्वरुप की इस दवा के एक ही दिन सुबह-दोपहर-शाम मे दो-दो बूंद सीधे जीभ पर डाल दीजिए|सिर्फ एक ही दिन मे तीन बार ले लीजिए फिर भविष्य मे कभी भी स्टोन नहीं बनेगा|
और एक बात इस BERBERIS VULGARIS से पीलिया jaundice भी ठीक होता है !
आपने पूरी post पढ़ी बहुत बहुत धन्यवाद !!

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

तीसरा उदाहरण थाईलैण्ड किस प्रकार बर्बाद हुआ वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ संस्थो के साथ चलते

तीसरा उदाहरण थाईलैण्ड किस प्रकार बर्बाद हुआ वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ संस्थो के साथ चलते

एक और देश है 'थाईलैण्ड उसकी तो अजब ही कहानी है ग्लोबलाईजेशन की, थाईलैण्ड ने 1990 में शुरु किया था ग्लोबलाईजेशन और थाईलैण्ड की अर्थ-व्यवस्था तो इण्डोनेशिया और दक्षिण कोरिया की तुलना में सिटी कंट्री जैसा है हमारी तुलना में भी दो जिला के बराबर है थाईलैण्ड की अर्थ-व्यवस्था, लेकिन इन्होंने भी इसी दौड़ में शामिल होकर कि अब देखिये ग्लोबलाईजेशन शुरु हो रहा है हम पीछे थोड़े ही रह सकते हैं किसी से, यदि हम नहीं दौड़ेंगे सब के साथ तो हम तो पीछे रह जायेंगे तो इसी डर में इण्डोनेशिया की सरकार के साथ थाईलैण्ड की सरकार नें कदम से मिलाकर चलना शुरु कर दिया । 
हमारे देश में भी कई ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि हम पीछे थोड़े ही रह सकते हैं किसी से, अमेरिका दौड़ रहा है यूरोप दौड़ रहा है तो हमको भी तो दौड़ना है 18 वीं शताब्दी में थोड़े ही जी सकते हैं। तो ऐसे ही थाईलैण्ड में भी सरकार ने कहना शुरु किया कि हम पीछे थोड़े ही रह सकते किसी से, पड़ोसी जो कर रहा है वो हम भी करेंगे तो पड़ोसी के घर में ये हो रहा है तो हम भी करेंगे तो थाईलैण्ड की सरकार भी चालू हो गई ग्लोबलाईजेशन और लिब्रलाईजेशन करना। अब उन्होंने भी मुद्रा का अवमूल्यन करना शुरु कर दिया, उनके यहाँ क्या एक शाक लगा कि हमारे आजू-बाजू की सरकारें बहुत शार्ट टर्म लोन ले रही हैं तो चलो हम भी ले लें तो उन्होंने भी चालू कर दिया है लोन लेना और अब ऐसा लगा कि पिछले 3-4 वर्षो में जो जितना लोन ले रहा है वही सबसे बड़ा वित्त मंत्री है। 
हमारे देश में भी ऐसा है कि जो वित्त मंत्री हमारे देश में सबसे अधिक विदेशी कर्जे के गढ्डे में पहुँचा दे वही सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री है हमारे देश में, तो थाईलैण्ड में भी हो गया तो उन्होंने भी लोन लेना चालू कर दिया देखा देखी पड़ोसी के चक्कर में, अब वहाँ क्या हुआ? अब वो भी बेचारे डूब गये हैं कहते हैं लोन इतना ले लिया है वहाँ की सरकार ने जितनी उनकी राष्ट्रीय आय नहीं है विदेशी ऋण का ब्याज नहीं चुका सकते वहाँ के प्रधानमंत्री ने तो अदभुत काम किया है जिसको मैं एकदम संसार में Extreme मानता हूँ क्या किया है उस प्रधानमंत्री ने एक दिन उसने संसद में घोषणा की चूँकि हमने ग्लोबलाईजेशन लिब्रलाईजेशन कर दिया उसमें तो अब देश डूब ही गया है विदेशी ऋण बहुत चढ़ गया है उसका ब्याज भी चुकाना है हमको, और अब हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है जिसको बेचकर हम हमारे देश का ऋण चुका सकें। अब हम नई नीति ला रहे हैं यह प्रधानमंत्री कह रहा है संसद में कि हम नई नीति ला रहे हैं संसद में कि वेश्यावृत्ति को वैधानिक व्यापार बना दिया जाये तो प्रधानमंत्री कह क्या रहा है सुनिये उसके शब्दों को कि हमारे पास कुछ भी ऐसा नहीं है जिसको बेचकर हम विदेशी ऋण का ब्याज चुका सकें तो अब हम हमारी माताओं और बहनों के शरीरों को बेचेंगे उससे कुछ डालर्स आयेंगे उससे विदेशी कर्जे का ब्याज चुकायेंगे। 


थाईलैण्ड का प्रधानमंत्री भारत सरकार को चेतावनी देना चाहता हूँ ।

अंत में उसने एक बहुत बुध्दिमानी की बात कही उसने कहा कि मैं भारत सरकार को चेतावनी देना चाहता हूँ ये थाईलैण्ड का प्रधानमंत्री कह रहा है कि मैं भारत सरकार को चेतावनी देना चाहता हूँ कि वो इस ग्लोबलाईजेशन के रास्ते पर जितनी शीघ्र हो चलना बंद कर दें नहीं तो भारत को जो हानि होगी उसकी कल्पना हम नहीं कर सकते, हमारा देश तो भारत की तुलना में सिटी कंट्री है और सही बात है हमारे देश के दो जिलों के बराबर है थाईलैण्ड वो कह रहा है हमारा देश तो भारत की तुलना में सिटी कंट्री है हम डूबे हैं तो इतनी भयंकर हानि हुई है और यदि भारत डूबेगा तो कल्पना नहीं कर सकते कि कितनी क्षति होगी । 

अर्थ-व्यवस्था मे मंदी वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की मुख्य भुमिका

जिस समय यह वैश्वीकरण (ग्लोबलाईजेशन) और उदारीकरण (लिब्रलाईजेशन) शुरु हुआ था उस दिन से आज तक मैं और मेरे कई साथी पूरी बारीकी से इस पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कर रहे थे और ये हम समझना चाहते थे कि ये ग्लोबलाईजेशन है या और भी कुछ इसमें है । तो ये ग्लोबलाईजेशन शुरु हुआ तो इसके साथ बहुत सारे वायदे थे बड़ी-बड़ी बातें थीं, जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी  वो आप शायद समझते होंगे उसको, या आपको स्मरण भी होगा कि 1990-91 में हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था में थोड़ी सी मंदी आ गई थी तो उस रुकावट को दूर करना है तो सिवाय ग्लोबलाईजेशन या लिब्रलाईजेशन के इस देश के पास कोई अन्य मार्ग नहीं है, ऐसी बात पूरे देश में कही गई थी और मुझे बराबर स्मरण है कि हमारे देश के मूर्धन्य अर्थशास्त्री लोगों ने ये कहना शुरु कर दिया था कि "चूँकि देश के पास विदेशी मुद्रा का भण्डार बहुत कम रह गया है और हमारे पास बहुत कठिनाई से 3 सप्ताह तक इम्पोर्ट बिल चुकाने की मुद्रा है तो हमको तो कुछ करना ही पड़ेगा।" तो हमारे पास बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस हो गई थी तो उस बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस को दूर करने के लिये हमारी सरकार ने आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक के पास एप्रोच किया था लोन के लिये, पैसे के लिये, ऋण लेने के लिये, तो 1991 में जब आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक में भारत सरकार का पत्र गया कि भारत को शीघ्र ऋण चाहिये आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक से, तो  आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की जैसी आदत है उन्होंने सबसे पहले ये कहना शुरु कर दिया कि आपको ऋण तो देंगे लेकिन उसके साथ हमारी कुछ शर्तें होंगी, तो आई.एम.एफ. की ओर से और वर्ल्ड बैंक की ओर से भारत सरकार को कुछ शर्तें पेश की गईं कि आप इन शर्तों को पूरा करें तो हम आपको कर्ज देने को तैयार हैं। तो वो शर्तें क्या थीं ?
वर्ल्ड बैंक और आई.एम.एफ. संस्थाओं की शर्तें क्या होती हैं?

सबसे पहली शर्त है आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की, जब भी कोई देश कठिन परिस्थिति में जाता है तो उनका एक रटा-रटाया प्रिस्क्रिप्शन है कि सबसे पहले आप अपने देश की करेंसी का अवमूल्यन कीजिये तब हम आपको ऋण दे देंगे और इस बात को प्रस्तुत करने का तरीका अलग है, तो ये कहते हैं कि आप अपने मुद्रा का अवमूल्यन इसलिये करिये ताकि आपका निर्यात अधिक हो जाये और चूँकि आपका निर्यात अधिक होगा तो आप अधिक डॉलर्स कमायेंगे और आप अधिक डॉलर्स कमा सकेंगे तभी आप हमारे लिये हुये कर्ज को वापस कर सकेंगे। तो इसको यदि एक पँक्ति में कहूँ तो आई.एम.एफ. का एक प्रिस्क्रिप्शन है जो वो संसार के सभी देशों में लागू करवाती है कि आप एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कीजिये, तो ये आई.एम.एफ. का पहला प्रिस्क्रिप्शन है । 

दूसरा उनका प्रिस्क्रिप्शन है कि आप जब एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कर देंगे तो फिर एक काम और कर दीजिये अपने देश का दरवाजा खोल दीजिये कि आपके देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आसानी से आ सकें और उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर जो आप पाबंदियाँ लगाते हैं जो रिस्ट्रिक्शन लगाते हैं उनको आप कम से कम कर दीजिये या इसे समाप्त कर दीजिये ताकि आपके बाजार में उनको व्यापार करने में कोई असुविधा ना हो, और क्यों आप अपने देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाइये ? आप यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलायेंगे अपने बाजार में तो इसके साथ हाईटेक बहुत आयेगा तकनीक बहुत आयेगी और जब तकनीक बहुत आयेगी तो आपके यहाँ गुणवत्ता युक्त माल बनना शुरु हो जायेंगे तो आप निर्यात अधिक कर पायेंगे। तो बहुराष्ट्रीय भी आपके बाजार में आके आपका प्रमोशन करेंगे आपके निर्यात को बढ़ायेंगे। 

तीसरा प्रिसिक्रप्शन अक्सर उनका ये रहा करता है कि आप अपने इण्टरनल मार्केट (घरेलू बाजार) में जो घरेलू उधोग को संरक्षण देते हैं वो संरक्षण देना बंद करें और यदि आप संरक्षण देना बंद करेंगे तो उसके बारे में IMF का ये मानना है कि आप एक Conservative अर्थ-शास्त्र को चलाने का प्रयास कर रहे हैं। तो आप घरेलू उधोग को प्रोटेक्शन मत दीजिये, बहुराष्ट्रीय को खुली छूट दे दीजिये पूँजी लाने की भी खुली छूट दे दीजिये और पूँजी ले जाने की भी खुली छूट दे दीजिये उनके ऊपर किसी प्रकार की भी पाबंदी नहीं होनी चाहिये और आप सब के सब फ्री ट्रेड (मुक्त व्यापार) के लिये अपने आपको तैयार कर लीजिये फिर इसके बाद कुछ और बातें भी बताई जाती हैं जैसे एक बात ये बताई जाती है कि भारत की अर्थ-व्यवस्था Competetive नहीं है तो आप जब तक दरवाजा नहीं खोलेंगे तो तब तक आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं आयेगी और आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी आपके देश के ग्राहक को उसकी बहुत हानि होगी। तो आपकी इकानमी में प्रतियोगिता होनी चाहिये ग्राहक को उसका लाभ होना चाहिये तो इसके लिये आवश्यक है कि आप अपने बाजार में या भारत के बाजार में आने की खुली छूट दें और ऐसे-ऐसे करके वो कुछ शर्ते बताते चले जाते हैं और संसार के बहुत सारे देश हैं जो उनको लागू करते चले जाते हैं। और एक बात मैं आपको और बता दूँ कि ये जो IMF, World Bank की जो शर्ते होती हैं वो शर्ते बस संसार के निर्धन देशों पर ही लागू होती हैं, एक सूचना मैं आपको ये दे दूँ कि अमेरिका और यूरोप के देश IMF से कर्ज लेते हैं और IMF और World Bank से कर्ज लेते हैं तो जो शर्ते वो हमारे ऊपर लगाते हैं वो शर्ते अमेरिका के ऊपर नहीं लगाई जाती, क्योंकि हमेशा से वो मानके चलते हैं कि अमेरिकन इकानमी पहले से ही भूमण्डलीये है यधपि ये सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था भूमण्डलीÏत है, दूसरा उनका ये मानना है कि अमेरिकन इकानमी में बहुत प्रतिस्पर्धा है ये उससे भी बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा है। तीसरी बात जो कहते हैं कि अमेरिकन पूरी तरह से फ्री इकानमी है ये संसार का सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकन अर्थव्यवस्था फ्री अर्थ-व्यवस्था है और फिर यूरोप के बारे में भी कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। तो मेरे मन में अक्सर ये प्रश्न उठता आया है कि जब World Bank से अमेरिका भी ऋण लेता है यूरोप भी ऋण लेता है तो उनके ऊपर भी शर्ते नहीं लगाई जाती ? 
वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की शर्ते अमेरिका और अन्य यूरोपियन ब्लाक पर कभी लागु नहीं की जाती क्यों ?

हमारे जैसे देश जब उनसे ऋण जाते हैं तब उनके ऊपर तत्काल शर्ते लगा दी जाती हैं, तो एक बार मन में आया कि ये जो IMF और World Bank चलती हैं उसके बारे में हमें समझना चाहिये कि अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक के लिये वो कभी शर्ते नहीं लगाते जो संसार के दूसरी या तीसरी दुनिया के देशों पर वो लगाते हैं तो उसका इतिहास बिल्कुल स्पष्ट यह बताता है कि ये बना कैसे,World Bank  और IMF दरअसल द्वितीय विश्वयुध्द में यूरोप और अमरीकी अर्थ-व्यवस्था तबाह (नष्ट) हो गई थी यूरोप को कुछ अधिक हानि हुई थी अमेरिका को कुछ कम, तो यूरोप और अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था जो द्वितीय विश्वयुध्द में नष्ट हुई तो उस अर्थ-व्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिये दो इंस्टीटयूट का जन्म हुआ World Bank और IMF के नाम पर Brettenwood नाम की एक जगह है, अमेरिका में एक गाँव जैसा है अभी वो थोड़ा बड़ा नगर हो गया है वहाँ पर एक संधि हुई थी जिसमें 44 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुये थे, उन लोगों ने एक संधि किया था जिसका नाम है 'Brettenwood संधि तो उस 'Brettenwood संधि के आधार पर World Bank और IMF का जन्म हुआ, द्वितीय विश्वयुध्द के बाद और जब से ये IMF और World Bank का जन्म हुआ है तब से वहाँ एक नीति चलती है, नीति ये चलती है कि IMF और World Bank में जो सदस्य देश हैं वो बिल्कुल लोकतांत्रिक नहीं हैं One Member One Vote कभी नहीं होता IMF में, और ना World Bank में होता है वहाँ अमेरिका के पास सबसे अधिक वोट हैं और अमेरिका का जो Voting share है IMF में और World Bank में भी वो करीब 20% है माने यदि अमेरिका यदि 1 वोट डालता है और उसकी जो कीमत है अगर कुल वोट की कीमत यदि 100 रुपया मानी जाये तो अमेरिका के वोट की कीमत 20 रुपये के बराबर होती है बाकी 80 रुपया की कीमत में दुनियो के सारे देश हैं और वो सारे देश की संख्या लगभग 117 है और IMF और World Bank में कभी भी लोकतंत्र आ नहीं पाया है और आने वाला भी नहीं है क्योंकि वो हमेशा से ढाँचा वैसा ही बनाकर रखना चाहते हैं। 
ये जो World Bank बना था वो इसलिये बना था ताकि दुनिया के तमाम देश युध्द के बाद द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जब  कम अवधी ऋण (शार्ट टर्म लोन) की आवश्यकता पड़े तात्कालिक कोई पेमेण्ट की आवश्यकता पड़े तो बैलेंस आफ पेमेंट की क्राईसेस हो जाये तो IMF उसके लिये कर्ज बाँटेगा और किसी देश को यदि इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट के लिये यदि लोन की आवश्यकता पड़े तो World Bank उसको बाँटेगा, तो इस तरह से बँटवारा हुआ था और उसमें एक महत्वपूर्ण बात है जो मुझे इन संस्थाओं का अध्ययन करने के बाद पता चली जो सामान्य लोगों को मालूम नहीं होती है IMF और World Bank जुड़वा कह सकते हैं एक दूसरे का, और इसमें होता क्या है कि यदि कोई देश World Bank से कर्जा लेने के लिये जाये तो World Bank की तरफ से यह कहा जाता है कि आप IMF की शर्तो को पूरा करिये, माने Cross conditionality की व्यवस्था चलती है और उसमें होता क्या है परोक्ष रूप से वो दोनो शर्ते वो लागू करवा देते हैं इन निर्धन देशों के ऊपर, और मैं कहना ये चाहता हूँ कि World Bank और IMF के तरफ से दी गई शर्ते या उसकी तरफ से दिये गये प्रिसिक्रप्शन कभी रिफार्म नहीं हो सकते ये रिफार्म शब्द का अपमान है ये World Bank और IMF बने ही हैं अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक की Hegemony को बनाये रखने के लिये।
 
भारतीयों से क्या गलती हुई?
हमारे यहाँ क्या त्रुटि हुई पिछले 7 वर्षो में हमारे यहाँ प्रेस ने विशेषकर अंग्रेजी प्रेस ने IMF और World Bank के प्रिसिक्रप्शन को रिफार्म के नाम पर प्रचारित करना शुरु कर दिया और IMF और World Bank की शर्तो को Globalization के रूप में प्रचार करना शुरु कर दिया। Globalization एक बहुत बड़ा व्यापक शब्द है और IMF और World Bank की शर्त बहुत छोटा शब्द है। तो हमसे जो त्रुटि हुई है पिछले 7 वर्षो में विशेषकर इस देश के Intellectual Class से सबसे बड़ी त्रुटि ये हुई कि IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश ने रिफार्म मानने की बड़ी भारी भूल की और IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश में New economy Policy के रूप में प्रचारित किया गया उसमें सरकार की हिस्सेदारी तो है ही, सरकार से अधिक इस देश में मीडिया की जिम्मेदारी थी। इन्हें इस देश के लोगों को साफ-साफ बताना चाहिये था कि इस देश में जो कुछ हो रहा है वो विश्व बैंक और IMF की शर्तो के कारण हो रहा है उसमें भारत सरकार अपनी इच्छा से शामिल है इस पर संदेह था। 

भारत अर्थव्यवस्था का ईतिहास

हमारे इस देश मे कोई आजादी आई नहीं ,यह देश आज भी उतना ही गुलाम है जितना कभी अंग्रेजो के समाने मे था, बल्की आज तो पहले से भी जादा हमारा देश गुलाम हैं । देश की व्यवस्थायें अंग्रेजो के जमाने से जादा गुलाम हैं । ब्रिटिश संसद मे १८१३ मे बहस चल रही है के भारत को गुलाम बनाने के लियें भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना हैं इसके लिये भारत के व्यापारीयोंओं को बर्बाद करना होगा । यदि भारत के व्यापारी बर्बाद हो जयेंगें तो ईस्ट ईन्डीया की कम्पनी का माल इस देश मे बिकने लगेगा । इस बहस मे एक अंग्रेज अधीकारी बीलव्र फोर्स क्या कहता हैं कि हमे भारत मे फ्री ट्रेड करना हैं । फ्री ट्रेड का मतलब "ब्रिटीश उत्पादो का भारत के गांव - गांव मे बिकना, ब्रिटीश उत्पादो का भारत के बाजार मे भर जाना और भारतवासीयों द्वारा जादा से जादा ब्रिटीश उत्पादो का उपभोग करना " और इसके दुसरे भाग में बीलव्र फोर्स कह रहा है कि "भारत मे बहुत अच्छा कंचा माल है जो सरा का सरा ब्रिटेन मे आयें जिस पर हमें एक पैसा भी खर्च ना करना पडे और उस माल को ब्रिटेन मे तैयार करके भारत के बाजारो मे बेचना और ब्रिटिश के माल पर कोई टेक्स नही लगेगा, यह हैं फ्री ट्रेड । यह फ्री ट्रेड आज भी भारत मे चलाया जा रहा हैं ग्लोबलीजेशन और लिब्रललीजेशन के नाम पर, जो १८१३ मे भी अंग्रेजो द्वारा चलाया गया था इस देश मे यहां की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लियें तो इसमे नया क्या हैं । तो १८१३में ईस्ट ईंन्डीया कम्पनी की सरकार फ्री ट्रेड के लियें अलग - अलग पोल्सियां बन रही है और वो पोल्सियां क्या है ? सब से पहली पोल्सी हैं कि ब्रिटिश माल पर कोई टेक्स नहीं लगेगा और भारतीये माल पर अधिक से अधिक टेक्स लगाया जाए । परिणाम क्या निकलेगा कि ब्रिटेन का माल सस्ता हो जाएगा और भारतीयें माल महंगा हो जायेंगा । ताकी ब्रेटेन का माल भारत के गांव -गांव मे बिके और भारत के व्यापारीयों का माल नही बिकेगा और भारत के व्यापारी बर्बाद हो जायेंगें । और भारत के व्यापारी बर्बाद हो गए तो भारत कि अर्थव्यवस्था भी बर्बाद हो जायेंगी । ब्रिटेन के माल पर को टेक्स नहीं और नाही कोई आयात टेक्स भी नहीं लगेगा । तो इस के लियें वह भारत में विभीन्न कानून बना रहे है इस देश में ताकी इस देश को बर्बाद किया जा सके । इसके लिये भारतवासीयों पर जो माल बना रहे है सबसे पहला टेक्स लगाया गया सेंट्राल एक्साईज एण्ड सोल्ट टेक्स ( वस्तूओ के उत्पादान पर टेक्स) जो भारत के लोग उत्पादन कर रहे है उस पर टेक्स लगाया । और वो लोग जब उन वस्तूओं को बाजार मे बेचने जाते है तो उसपर भी टेक्स (सेल्स टेक्स) और अब जो माल बैचने से जो आमनदनी हूई है उस पर भी टेक्स लगा दिया आयेकर ( ईन्काम टेक्स) । तथा वस्तूओं के लाने ले जाने पर भी एक टेक्स लगा दिया ऑक्ट्रोये टेक्स (चूंगी नाका टेक्स) तथा ईस्ट ईण्डीया कि कम्पनी भारत में कोई पुल बना देते थे तो उस पूल पर से कोई गाडी जायें तो उस पर भी टोल टेक्स। इस प्रकार के पांचो टेक्स अंग्रेज लगा रहे हैं ताकी भारतीयां व्यापारीयोंओं को बर्बाद कर सकें । और आप को यह जान कार अश्चर्यी होगा की यह पांचो के पांचों टेक्स आज भी इस देश मे ही चल रहे है । अंग्रेजों ने तो समझ मे आता हैं की भारत को बर्बाद करने के लियें यह टेक्स लगायें थे । कूल मिलाकर इन पांचो टेक्सों को देखें तो १०० रू कि वस्तू पर १२७ रु का टेक्स देना पड रहा था । अब भारतीयें व्यापारीओं का माल महंगा होगया और दुसरी तरफ ब्रिटीश माल पर सभी प्रकार के टेक्सों को हटा दिया गया ताकी ब्रिटीश माल सस्ता हो जायें और गांव - गांव मे उनका माल बिके । जब १०० रु की वस्तू पर १२७ रु देने पडे तो वह व्यापारी बर्बाद हो जाएगा मर जाएगा या तो वोह व्यापारी बईमान बन जायेंगा तो दोनो ही तरफ से लडू अंग्रेजो के हाथ मे है कयोकी व्यापारी बईमान बना तो , बईमान व्यक्ति कभी आंख मिलाकर बात नही कर सकता तो यो हमारा गुलाम बन जयेंगा या बर्बाद हो गाया तो भी वो हमारा गुलाम बन जायेंगा । तो व्यापारी किस प्रकार बर्बाद हुयें यह समझ मे आ गया होगा । अंग्रेजों ने इस देश मे टेक्सेशन का सीस्टाम क्यों लायें इस देश के व्यापारीओं को बईमान बनाने के लिए कि वो टेक्स कि चोरी करें या बर्बाद हो जाए । इस के लियें उन्होने अलग- अलग विभाग भी बनाए,सेंट्राल एक्साईज विभाग, सेल्स टेक्स विभाग, ईन्काम टेक्स विभाग,ऑक्ट्रोये टेक्स विभाग और टोल टेक्स विभाग । जो आज भी चल रहे हैं । आप ध्यान से सोचे कि अंग्रेज तो इस देश को बर्बाद करना चाहते थे इसलिए टेक्सेशन का सीस्टाम लयें परन्तू आज भी वही टेक्सेशन का सीस्टाम चल रहा है क्यों ? अंग्रेजों ने ईन्काम टेक्स लगाया तो कितना लगाया ९७% टेक्स । मतलब १०० रू पर ९७ रु टेक्स आप को केवल ३ रू ही मिलेंगें । और आप को यह जान कर अश्चर्यी होगा की देश आजाद हुआ १९४७ को और तब भी इस देश मे टेक्स ९७% ही लगता रहा १९७१-७२ तक क्यों ? परन्तू आजाद होने के बाद भी हमरी सरकार इन टेक्सो को क्यों लगा रही हैं ? बल्की आज तो और भी कई और नये टेक्स लगा दियें गयें हैं । यदि विदेशी देशो में एक से दो प्रकार के टेक्स ही लगायें जाते है जबकी भारत मे ६४ प्रकार के अप्रत्याक्ष वं एक परोक्ष टेक्स लगाए जाते है । मान लीजियें १०० रुपये के वस्तू पर कूल टेस्क को जोडा जाये तो ६५% तो टेक्स ही देना पड्ता है यानि १०० रु की वस्तू १६५ रु मे मिलेगी । डब्लू.टी.औ. कुल १२४ देशो में लागू है २००५ के राजीव भाई के व्याख्यां में बता रहें है एक देश हैं अमेरीका किस पर पछ्ले २० वर्षो से संसाद मे बहस चल रही हैं परन्त वह वैट टेक्स नहीं ला रहे आपने देश में और उनमें से १२३ देश एसे हैं जिनदेशों मे वैट टेक्स तो लागू हुआ परन्तू एक भी अप्रत्याक्ष टेक्स नहीं हैं इस देश में और हमारे देश मे १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उस्में वैट १५वां टेक्स और आ गया हैं ब्राजील मे संसाद मे और संसाद के बाहर २० वर्षो तक बहस की लोगों ने व्यापरियों ने और सुझाव दियें सुके अनूसार वैट टेक्स आया और वैट टेक्स आने से पहले सारे के सारे अप्रत्यक्ष टेक्सों को समाप्त किया फिर वैट टेक्स आया और भारत में उस पर कोई बहस नही हूई उसे हस्ताक्षर करने से पहले और जिन मत्रीयों ने यह वैट लाया उन्हों ने भी इसे लाने से पहले नहीं पडा । जर्मनी मे भी १२-१५वर्षॉं तक बहस चली । मुख्य बात जो कहना चाहता हू वो यह कि सभी १२३ देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स आया हैं वहॉ पर कोई भी अप्रत्यक्ष टेक्स नहीं हैं और उनमें से २३ देश तो एसे है जिनमें प्रत्यक्ष टेक्स भी नहीं हैं केवल एक ही टेक्स हैं वैट टेक्स । उदहारण के रुप में स्वीजार्लेण्ड में एक ही टेक्स हैं वैटे टेक्स वहॉ पर इनकम टेक्स भी नही सेल्स टेक्स भी नहीं कोई दुसरा टेक्स नहीं । और उदहारण दूं लग्ज्मबर्ग एक देश है, पनामा एक देश है एसे २३ देश हैं दुनियां में जिनमें वैट के अलावा कोई दुसरा टेक्स नहीं हैं ८४ देश एसे हैं दुनियां में जहॉ पर दो टेक्स हैं एक इनकम टेक्स और दुसरा वैट टेक्स हैं । अब भारत की बात करें । भारत में एक प्रत्यक्ष टेक्स हैं और १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उपर से वैट टेक्स भी क्यों ? जिदेशो में प्रत्यक्ष टेक्स और अप्रत्यक्ष टेक्स दोनो समाप्त हो गयें और केवल एक ही टेक्स रह गया तो उनके तो मजे हो गए परन्तू भारत में ? अब आपको पता चले की जिन देशो में इन सारे टेक्सों को हटा कर वैट टेक्स लाया उस वैट टेक्स की दर भारत के वैट टेक्स की तुलना मे कम हैं तो ? और वहॉ पर वैट टेक्स भी सभी वसतूओं पर नहीं है । और एक बात बडी महत्व की हैं सभी वैट टेक्स वाले देशो में एक कानून हैं "क्सटोडीयान कानून" इस मतलब सरकार टेक्स की मालीक नहीं हैं वह केवल क्सटोडीयान हैं उस टेक्स के पैसे को देश के विकास में लागा सकती हैं या सम्भाल के रख सकती हैं इसका मतलाब उस पैसे की मालीक नहीं हैं मालीक तो टेक्स भरने वाला हैं जब उसे पैसे की अवश्यकता हो तो सरकार को सारा पैसा अपको देगीं । मान लिजियें कि यदि आप जर्मन मे रह रहें हैं और आपने २१ वर्षो तक वैट टेक्स भरा और उसके बाद आप उस देश को छोड कर दुसरे देश हमेशा के लियें जाना चाहते हैं तो सरकार आप की टेक्स एक -एक पैसा आप को उसी दिन आप को देगी और आपको एक धन्यावाद पत्र भी देगी । इस प्रकार का नियम है सभी देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स लिया जाता है भारत को छोड कर । और एक बात यदि कोई भूक्कांप आ गया या बाड आगई तो आप का सब दूकान मकांन बर्बाद हो गया तो भी सरकार आप का सारा टेक्स आप को देगी और अगले तीन वर्षो तक आप से कोई टेक्स नही लेगी । भारत मे एसा कोई नियम नहीं हैं और एसी सम्भावना भी नहीं हैं भारत को छोड कर सभी देशो वैट वाले देशो में यह नियम है सिन्गल पोईन्ट वैट हैं और भारत मे मलटी पोईन्ट वैट है (मतलब एक वस्तू पर एक ही बार वैट टेक्स लगेगा ) और नियम है वैट टेक्स सेन्ट्रालाईज केन्द्र सरकार द्वारा है जबकी भारत में वैट टेक्स राज्य स्तर पर लगता है तो अलग राज्य तो मे अलग नियम तो बहुत समस्या होती है वैट को लेकर यदि वस्तू एक राज्य से दुसरे राज्य में जायें तो । एक और नियम हैं  वैट टेक्स कि दर बहूत कम हैं भारत कि तूलना में । और एक बात जो टेक्स अधीकारी होता हैं  उसे कोई जूडीशीयल अधीकार नही होता हैं (मतलब आपको जेल भेजने का अधिकार या आपकी सम्पति को जब्त करके उसकी निलामी करने का अधिकार एसा कोई भी अधिकार टेक्स के किसी भी अधिकारी को नही हैं ।) भारत मे एक और वैट टेक्स मे डाला गया हैं की सभी अंतराष्ट्रीयां संस्था प्रोफीटेव्ल और नोन प्रोफीटेव्ल पर कोई वैट टेक्स नहीं लगेगा । इसका मतलब सभी चर्च अब टेक्स से बहार होंगें और सभी मंदिरों पर अब टेक्स लगेगां क्यों ?हमारे देश मे शराब पर वैट टेक्स नहीं है और लाट्रीओं पर टेक्स नहीं हैं परन्तू दूध पर वैट टेक्स हैं नमक पर वैट टेक्स हैं  मतलब सरकार चाहती हैं की हम शराब पियें दूध को छोड कर । मैं कैसे यह मानू की यह देश अजाद हो गया हैं ।


अंग्रेजों की संसाद में एक बहस चल रही है कि भारत का कुल व्यापार कितना है ? तो इस का जवाब विलीयम एडम भारत के कई रेवेनू के अधिकारियों कि मद्द से सर्वे करने के बाद देता है कि भारत का कुल व्यापार १८३५-५० तक १/३ प्रतिशत था , या दुसरी तरह से कहें के  सारी दुनियां का कुल ट्रेड मान लिजियें की १०० बिलीयान डालार हो तो उस समय केवल भारत का ट्रेड ३३बिलीयान डालार था या तीसरी तरह से कहें तो भारत का कुल निर्यात दुनियां के कुल निर्यात का ३३% था । जब्कि उस समय भारत में कोई बडा प्रोजेक्ट नहीं था और ना ही इतने ईन्वेश्मेंटर थे । वो भी तब जब अंग्रेज भारत को बर्बाद करने पर तुले हूए थे ।  आज क्या स्तिति है ? आज भारत का कुल उत्पाद दुनिया  के कुल उत्पाद का ०.०१ प्रतिशत हैं । तो हम विकास कर रहे है या विनाश की और बड रहे हैं जरा सोचीयें ।


तो जरा सोचो के भारत पर जब कोई टेक्स नही लगा था तब तक भारत ३३% का उत्पादन करता था और आज भारतीयों पर टेक्स लगा -लगा कर बर्बाद कर दिया है आजादी के बाद भी हमारा खुन चूसा जा रहा हैं टेक्सो के द्वारा हमे आज भी बईमान बनाया जा रहा है ताकि हम गलत बात का विरोध ना कर सकें और वो अपनी मन्शाओं को पुरा करते रहें । 


विलीयम एडम के सर्वे के अनुसार १८३५-५० तक भारत में स्टील बनाने वाली १०००० फेक्ट्रीयां थी ।  भारत कि उन १०००० स्टील की फेक्ट्रीयांओं से कुल स्टील का उत्पादन ८० से ९० लाख टंन होता था सन १८३५-५० तक और आज भारत में इतने बडे - बडे स्टील पलान्ट, इतनी मशीनें , इतने विदेशी कम्पनियां और इतने सारे स्टील के फेक्ट्रीयां परन्तू कुल उत्पादन ७० से ७५ लाख टंन प्रति वर्ष था । उनमे जो स्टील बन रहा था उसकी गुणवता (कूवालीटी ) क्या थी ?  उस पर वर्षो -वर्ष जंग नहीं लगता था इतना बडीयां गुण्वत्ता का स्टील भारत में बनता रहा १८३५-५० तक । जिसका जीवांत उदाहरण हैं मेहरोली में लोहे का अशोक स्तम्भ । और आज का स्टील यदि वर्षा के पानी में छोड दें तो ३ महीने में ही लोहे पर जंग लग जायेंगा । और यह स्टील कि सबसे अधिक फेक्ट्रीयां सर्गूजा मध्य प्रदेश मे है क्यों की दूनियां का सबसे अच्छा आईरन ऑर सबसे अधिक मात्रा में भारत के सर्गूजा में पाया जाता हैं, और जो इस तकनिक को जानते है उन्हे हम आदिवासी कहते हैं उन के पास कोई डीग्री नहीं है परन्तू वह सबसे अच्छा स्टील बनाने की कला जानते हैं परन्तू हम मनते हैं कि जिसके पास कोई डीग्री नहीं हैं वो अशिक्षीत हैं ,मुर्ख हैं । जबकी उनके पास सबसे उत्तम तकनीक हैं जो आज धीरे -धीरे   लूप्त होती जा रही है हमरी गलती के कारण । अंग्रेजों ने इस कला को बर्बाद करने के लिये भी एक कानून ( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट)  बनाया था जिसके अनूसार स्थानीयें आदीवासीओं को लोहे से अच्छी स्टील बनाना जानते थे उन्हे खादानो से कंचा माल नही लेने देते थे । यदि वह खदानों से कचा माल लें तो उनको ४० कोडे मारे जाते थे और उस पर भी यदि वह व्यक्ति नहीं मरे तो उसको गोली मार दी जाती थी इसना सख्त कानून बना दिया ।  तो बीना कचां माल के वह लोग भूखे मरने लगे । और उन्हीं  खदानों से अंग्रेज लोहा खोद - खोद कर ले जाते थे । और स्टील की विभिन्न वस्तूएं बनाकर हमरे बाजारो में बेचा करते थे । आज भी वोही कानून( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट) चल रहा है भारत के मूल निवासी (आदिवासी) लोहा नही ले जा सकते । जबकी जापान कि काम्पनी निपन्डेरनू  (एसी ही और भी विदेशी कम्पनियां) । आज भी कचा माल कोडीयों केदाम खोद - खोद कर ले जा रही है और स्टील बनाकर हमे ही उंच्चे दामॉ पर बेच रही हैं ।  आज भी सर्गुजा मे कुछ आदिवासी लोग हैं जो उस तकनीक को जानते है परन्तू उनको आज भी उसी कानून के कारण स्टील नही लेने दिया जाता । तो हम कैसे अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारे जब हमे ही हमारा कचां माल नही लेने दिया जाता और विदेशी कम्पनियों को कोडीयों के दाम पर कचां माल खोद-खोद करे लें जा रही हैं । और क्यों कोई राजनितिक पार्टी , भारत देश के लोग इस पर विचार नही मरते । क्यों नहीं इस कानून को रद्द किया जाता हैं । कैसे में मानू के यह देश आजाद हो गया ?
अशोक स्तम्भ
भारत में बहुत अच्छा कपडा बनाने वाले बडीयां कारीगर होते था वो कपडा इतना बारीक बुनाई करते थे की कोई मशीन भी नहीं कर सकती । उस कपडे के थान के थान एक छोटी सी अंगूठी में से निकल जाते थे । पूरी दुनियां मे प्रसिध्द था भारत का कपडा १८३५-५० तक । भारत मे उस समय तक दो ही वस्तूएं सबसे जादा निर्यात होती थी कपडा और मसाले । अंग्रेजो का कपडा लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा बिक नही पाता था क्योंकी भारत का ही कपडा इतना बडीयां होता था । तो फ्री ट्रेड के नाम पर अंग्रेजों ने उन सब करीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें  । सुरत में १००००० बहतरीन कारीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें । बिहार मे एक इलाका हैं मधूबनी । मधूबनी मे २५०००० से ३००००० कारीगरों के हाथ कटवा दियें अंग्रेजों ने । इस पर अंग्रेज बडा गर्व करते है, कयोकी भारत का सबसे बडा उद्योग हैं कपडा मील्ले और कारीगर नही रहेंगे तो कपडा मील्ले नही चल सकती और जब कपडा मील्ले धराशाही होगी तो भारत की अर्थव्यवस्था भी धराशाही हो जाएगी । यह एक वार्ता हैं ब्रिटीश की संसाद मे चल रही हैं । और उसके बाद अंग्रेजों ने यह कर दिया हैं  ताकी अंग्रेजो का माल (लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा ) भारत मे बिक पायें । और अंग्रेजों ने अपने कपडों पर से सारे टेक्स हटा लियें और भारत की कपडा मील्लों पर अतीरीक्त टेक्स लगाया । सुरत की कपडा मील्लों पर १०००% अतीरिक्त टेक्स लगा दिया । 
ताकी यह उद्योग बन्द हो जायें । और लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा  बिकने लगे ।

अब कपडा बनाने के लियें कच्चा माल अंग्रेजों को चाहीयें तो भारत का कोटन ब्रिटेन मे जाने लगा । तो अंग्रेजों को बडा परीशाम करना पडता था तो अंग्रेजों ने जहां - जहा पर अच्छे कोटन (कच्चा माल) मिलता था वहां - वहां पर अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लियें रेलगाडी चलाई इस देश में । आपको लगता होगा कि अंग्रेज नही आते तो रेलगाडी नही होती इस देश में परन्तू आप यह नही जानते की अंग्रेजो ने रेल इस लियें चलाई ताकी अंग्रेजे भारत के गांव - गांव से कोटन को ईकाठा करके मुम्बाई ले जा सके और मुम्बाई के बन्द्रगाह से जहाजॐ के द्वारा कोटन को ब्रिटेन ले जा सके । और बाद में इसी रेल  का एक और प्रयोग होने लगा । अंदोलन को कुचलने के लियें जल्दी से जल्दी भारत के विभिन्न क्षेत्रो मे सेना को पहुंचाने के लिए रेल का प्रयोग भी किया जाने लगा ।  अंग्रेजों के सबसे पहले रेल जो चलाई है मुम्बाई से थाना के बीच में ट्राईल के रुप में । जब बाद मे प्रयोग सफल हो गया तो सबसे पहले अंग्रेजों ने रेल चलाई है मुम्बाई से अहमदाबाद मे बीच में जो कपास के लिये सबसे अच्छा उत्पादान करते हैं ।  अब अंग्रेजों के कपास को ईकाठा कर के मुम्बाई के बंद्र्गाह से कपास के जहाज तो भर कर भेजना शुरु कर दियें परन्तू इंग्लेंड से खाली जहाज आते थे तो खाली जहाज समून्द्र में डुब जाते थे । तो इसके लियें उन्हो ने समून्द्री जहाजों में नमक भर कर भेजना शुरु कर दिया । समून्द्री जहाजों में नमक भर कर ईंग्लेंड से आते थे और मुम्बाई के बन्द्रगाह पर नमक डाल देते थे । और यहां से कपास भर कर ले जाते थे । भारत में उस समय तक सभी लोग स्वादेशी नमक ही खाते थे । परन्तू अग्रेजों ने स्वदेशी नमक पर भी टेक्स लगा दियें और अपना नमक टेक्स फ्री बेचने लगें ताकी सभी उनका नमक खाएं । इस पर महात्मा गांधी जी ने डांडी सत्यग्रह किया । ६ अप्रेल १९३० में महात्मा गांघी जी ने एक मूठ्ठी हाथ मे लेकर कसम खाई थी के भारत में विदेशी नमक नहीं बिकने दूंगा । और आज भारत में कितने ही विदेशी नमक बिक रहे हैं पत्ता नहीं गांघी जी कि आत्मा को कितना दुःख होता होगा यह देख कर । हमारी सरकारो ने विदेशी कम्पनियों को नमक बनाने के लियें भी अनूमती दे दी । जरा आप बातायें कि नमक बनाने मे कॉन सी हाईटेक तकनीक हैं । समून्द्र का पानी एक जगह ईकाठा कर लेते हैं और धूप में  पानी भाप बन कर ऊड जाता हैं और नमक नीचे रह जाता हैं क्या भारत के लोग इतना भी नहीं कर सकते हैं । कि विदेशी कम्पनियाओं को नमक बनाने के लिये अनूमती दे दी । गांधीजी कि आत्मा कितने आंसू बाहाती होगी यह देख कर कि जिस देश मे मेने नमक सत्यग्रह किया वहां पर आजादी के बाद भी आज तक विदेशी नमक बिक रहा हैं जरा सोचीयें कि यह कितना बडा नेशनल क्राईम हैं । अंग्रेजों ने जो - जो व्यवस्थायें बनाई सभी इस देश मे आज भी चल रही हैं । तो मैं यह कैसे मानू की यह देश आजाद हो चूका हैं ।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

कही आप भी जहर तो नहीं पी रहे ! दुनिया में हो रहे गाय के दूध के दुष्चक्र को समझिए !

भारत में गाय की 37 प्रकार की शुद्ध नस्ल पायी जाती है| जिसमें सबसे ज्यादा दूध देने वाली नस्ल निम्न हैं –
1)गिर गाय (सालाना-2000-6000 लीटर दूध ,स्थान -सौराष्ट्र ,गुजरात)
2)साहिवाल गाय (सालाना-2000-4000 लीटर दूध ,स्थान -UP,हरियाणा,पंजाब)
3)लाल सिंधी ( सालाना-2000-4000 लीटर दूध ,स्थान -उत्पत्ति सिंध में लेकिन अभी पूरे भारत में)
4)राठी (सालाना-1800-3500 लीटर दूध, स्थान-राजस्थान,हरियाणा,पंजाब)
5)थरपार्कर(सालाना-1800-3500 लीटर दूध,स्थान-सिंध,कच्छ,जैसलमेर,जोधपुर)
6)कांक्रेज (सालाना-1500-4000 लीटर दूध,स्थान-उत्तरी गुजरात व राजस्थान)
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### एक शोधपूर्ण सच्चाई ###
ब्राजील देश ने हमारी देसी गायों का आयात कर अब तक 65 लाख गायों की संख्या कर ली है । और इससे भी दोगुनी उन लोंगो ने दूसरे देशों में निर्यात की है।
google पर indian cow in brazil सर्च कर सकते है !
उन लोगों ने दिल से इन गौवंश ( हाँ , सांडो सहित ) की सेवा कर आज औसत में एक गाय से दिनभर में करीब 40 लीटर दूध पाने की शानदार स्थिति बना ली ।
 अब सुनिए दूसरी बात :
ब्राजील इस दूध से पाउडर बना कर ऑस्ट्रेलिया ,डैनमार्क को निर्यात करता है ।
जबकि डैनमार्क जैसे देश मे आदमी से अधिक गाय है लेकिन वो अपनी गाय का दूध नहीं पीते ! वहाँ ‘milk is white poison’ वाली बात प्रचलित है !
और तो और ऑस्ट्रेलिया ,डैनमार्क आदि देश अपनी जर्सी -होलस्टीन युवान ( जिन्हें हम गाय कहते नहीं थकते ! ) के दूध से पाउडर निकाल कर हमारे देश भारत को भेजता है । इस पाउडर को ऑस्ट्रेलिया में उपयोग में लाने पर कड़ा प्रतिबन्ध है । वे सिर्फ ब्राजील के दूध पाउडर को ही उपयोग में लाते हैं ।
क्यों ? क्योंकि ऑस्ट्रेलिया,डैनमार्क आदि देशो की गायों का दूध से डायबिटीज़, कैंसर जैसी भयंकर बीमारी फैलती है । आज हमारा भारत डायबिटीज़ व कैंसर की बीमारी की विश्व राजधानी बनता जा रहा है । भारत की प्रत्येक डेयरी में हुए सम्पूर्ण दूध में से फेट ( क्रीम-मक्खन ) निकालकर उसमे इस आयातित दूषित ऑस्ट्रेलियन , डैनमार्क दूध पाउडर को मिलाकर प्रोसेस किया जाकर थैलियों के माध्यम से हमारी रसोई तक पहुंचाया जाता है ।
ये कैसा दुष्चक्र है !!!! भारत की देसी गाय ब्राजील, वहां से दूध पाउडर ? ऑस्ट्रेलिया का दूषित दूध पाउडर भारत ? और फिर होता है दवाइयों का आयात ।
साथियों, थैली के दूध का प्रयोग तुरन्त बन्द करो । देसी गाय के दूध को किसी भी कीमत पर प्राप्त कर स्वास्थ्य को बचाओ । वैज्ञानिक भाषा मे देसी गाय के दूध तो A2 कहते है और विदेशी (जर्सी हालेस्टियन) गायों के दूध को A1 कहते है ! दोनों के दूध मे क्या अंतर है सैंकड़ों रिसर्च विदेशो मे हो चुकी है !
मित्रो जब आप विदेशी गाय जैसे जर्सी,हाले स्टियन आदि पर ज्यादा रिसर्च करेंगे आपको पता चलेगा की इन्हे सूअर से artificial insemination कर के विकसित किया गया है ।
मित्रो आप देसी गाय के दूध का महत्व समझे अन्य लोगो को समझाएँ ,विदेशी गाय (पूतना भगवान कृष्ण को मरने आई थी ) का दूध ना पीये !
हमारे मूर्ख नीति निर्धारकों ने दूध की मात्रा को गौमाता की उपयोगिता का मापदंड बना दिया। भारतीय संस्कृति का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता था। मित्रो हमने अपनी कमियों को सुधारने की बजाय अपनी गौमाता पर ही कम दूध देने का लांछन लगा दिया। इतिहास गवाह है कि भारत वर्ष में जब तक गौ वास्तव में माता जैसा व्यवहार पाती थी – उसके रख-रखाव, आवास, आहार की उचित व्यवस्था थी, देश में कभी भी दूध का अभाव नहीं रहा।
 मित्रो दूध को एक तरफ छोड़ भी दे तो भी गौ माता जीवन के पहले दिन से अंतिम दिन तक गोबर और गौ मूत्र देती है जिससे रसोई गैस का सिलंडर चलता है और गाड़ी भी चलती है

रविवार, 7 अगस्त 2016

शादीशुदा जोड़ो के लिए परिवार नियोजन उपाय

बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी जरूर पढ़ें !
मित्रो हमारे बच्चे स्‍वस्थ हों, तन्दरुस्त हों, मेधावी हों, उनके जीवन मे इंटेलिजेन्सी हमेशा हो, | Q अच्छा रहे, समाज का काम करें, इनके लिए क्या करें:
इनका उपाय निम्नलिखित है:
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1. किसी भी माँ या पिता को अपने जीवन मे सबसे अच्छा बच्चा चाहिए तो उनका नियोजन करना पड़ेगा.
– बिना नियोजन के बच्चे दाऊद इब्राहिम होते हैं. माता बहन को पीटते हैं.
– हम हर चीज़ के लिए नियोजन करते हैं, घर बनाने के लिए, आदि, ऐसे ही बच्चे के लिए भी नियोजन करिए.
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– नियोजन मे क्या करना होगा? सबसे पहला नियोजन संयम पालना पड़ेगा. ज़्यादा समय ब्रह्मचर्या का पालन करना. स्त्री के लिए संयम रखना बहुत सरल है, पुरुषों के लिए कठिन है. साल मे एक या 2 बार ही संसर्ग करें, या फिर महीने मे बस एक बार ही पत्नी के साथ समागम हो. इसके लिए संकल्प मजबूत रहना चाहिए, और वो मजबूत करने के लिए अदरक काम आएगा, अदरक मुँह मे रख कर चूसते रहें. ये अदरक हर तरह का संकल्प मजबूत करने मे सहायता करता है.
2. नियमित रूप से जीवन मे चूना का सेवन करना, दोनो स्त्री पुरुष चूना खाएँ.
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– चूना 1 व्यक्ति दिन मे बस 1 ग्राम तक ही खाए, दूध छोड़ कर किसी भी तरल पदार्थ मे घोल कर पीना है, पान वाला चूना. जैसे पानी, दही, जूस दाल आदि.
नोट: पथरी के रोगी के लिए चूना वर्जित है.
3. ख़ान पान का ध्यान रखना.
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– राणा प्रताप, शिवा जी जैसे बच्चे चाहिए तो सात्विक भोजन करें स्त्री पुरुष. माँस, मछ्ली, अंडा, शराब सिगरेट सब वर्जित. शाकाहारी जीवन.
– शाकाहारी भोजन मे कुछ चीज़ें अवश्य हों, जैसे देशी गाय का दूध, दही, मक्खन, घी, ये सब अधिक उपयोग करना. मक्खन के साथ मिश्री ज़रूर खाएँ नियमित रूप से. मात्रा: 25 ग्राम मक्खन के साथ 10 ग्राम मिश्री.
– तिल, मूँग की दाल, मसूर की दाल, सीज़न वाले फल, जैसे गर्मी मे आम. नियमित रूप से खाना है ये सब
– फल कभी भी भोजन के साथ नही खाना अलग से खाना फल. खाने के 2-3 घंटे बाद फल खाना, या फिर सुबहा फल का ही नाश्ता करें, रात मे फल नही खाना.
4. शारीरिक श्रम नियमित रूप से करें दोनो पति पत्नी.
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– शारीरिक श्रम करें दोनो पति पत्नी. महिलाएँ ऐसा श्रम करें जिसमे गर्भाशय का मूव्मेंट हो. चटनी बनाना, कपड़े धोना, रोटी बनाना, ये सब काम हाथ से ही करें. चाकी चलाना सबसे अच्छा है, दिन मे बस 15 मिनिट. सबसे अच्छी संतान होगी.
– पुरुषों के लिए शरीर श्रम: नागर चलाना, नागार नही चला सकते तो, सीढ़ियाँ चढ़ना और उतरना. या फिर ज़्यादा पैदल चलना.
5. संतान का रंग साफ पाने के लिए.
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– वैसे तो व्यक्ति को उसके कर्मो से जानना चाहिए रंग रूप से नहीं !फिर भी जो लोग अपनी संतान का रंग साफ चाहते हैं, वो दोनो पति पत्नी हल्दी का दूध पीएँ, रात्रि को दूध मे हल्दी मिला कर पीएँ, संतान का रंग दोनो माता पिता से साफ होगा.
6. संतान खूब तेज बुद्धि वाली हो इसके लिए:
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– दही चूना मिला कर खाते रहना; देशी गाय का दूध लो, उसका दही जमाना चाँदी के बर्तन मे सुबह खाली पेट उसमे चूना मिला कर खाना, दोनो पति पत्नी. चूना वैसे ही लेना है प्रति व्यक्ति 1 ग्राम या गेहू के 1 दाने के बराबर. नोट: पथरी के रोगियों के लिए चूना वर्जित है ध्यान रहे.
7. तेजस्वी संताप प्राप्ति हेतु समागम करने के लिए आदर्श दिन:
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– पत्नी का मासिक शुरू होने वाले दिन से 10 दिन बाद और 18 दिन पहले, इस बीच का जो 7 दिन है वो संतान प्राप्ति के लिए सबसे अच्छा समय है. तेजस्वी और गुणी संतान होगी.
– इसमे 2 तरह के दिन आएँगे सम और विशॅम; जैसे 10 सम, 11 विषम, 12 सम, 13 विषम…. आदि; यदि सम दिन मे समागम करेंगे तो 99% पुत्र होगा, और विषम वाले दिन संसर्ग करेंगे तो पुत्री होगी. महिलाओं मे X और X गुण सूत्र होते हैं, और पुरुषों मे X और Y होते हैं, सम वाले दिन, Y अधिक सक्रिय हो जाता है, तब Y और X मिल कर पुत्र होते हैं, विषम दिन X सक्रिय होता है तो X और X मिल कर पुत्री होती है.
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8. शुकलपक्ष के दिनो मे समागम करने से पुत्र या पुत्री 99% प्रतापी, तेजस्वी, लड़ने भिड़ने वाले होंगे, कृष्नपक्ष मे अच्छे साहित्यकार, वैग्यानिक, डॉक्टर्स, इंजिनीयर्स, सीए होंगे.
– छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप, भगत सिंग, उधम सिंग, आज़ाद. ये सब शुकलपक्ष वाले हैं. शुकलपक्ष माने चंद्रमा लगातार बढ़ता हुआ होता है.
– न्यूटेन, गगदीश चंद्रा खुराना, जगदीश चंद्र बोस आदि, सब कृष्नपक्ष वाले हैं.
– चंद्रमा के शरीर पर पड़ने वाली ऊर्जा का सब चक्कर है, आप जानते हैं कृष्णपाक्ष मे चंद्रमा नही होता और शुकलपक्ष मे चंद्रमा बहुत तीव्र होता है. चंद्रमा का प्रकाश अपना नही है. वो सूर्य से आता है, शुकलपक्ष मे सूर्य की तीव्रता है, तो सूर्य का तेज आता है संतानों मे.
– कृष्णपाक्ष मे सूर्य का प्रताप नही है तो वो दिमाग़ वाली संतान होंगी.
– अगर आप 2 बच्चे कर रहे हैं तो इस प्रकार नियोजन करें की एक संतान शुकलपक्ष की और एक संतान कृष्णपाक्ष की.
9. मंदबुद्धि बच्चे कहाँ से आते हैं?
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– ये बच्चे उन माता पिता के हैं जिनके शरीर मे कॅल्षियम बहुत कम है. इनके बच्चे मतिमन्द होने ही वाले हैं, विकलांग होने ही वाले हैं. कॅल्षियम का टेस्ट होता है, पेतॉलजी मे हो जाएगा. सस्ते मे हो जाता है कॅल्षियम टेस्ट शरीर का. चुना कैल्शियम का सबसे अच्छा स्त्रोत है !
– महाराष्ट्र मे कोंकण बेल्ट के बच्चे खूब तेज बुद्धि वाले होते हैं, उनकी आँखे भी दुनिया मे सबसे सुंदर होती हैं. आई क्यू सबसे अधिक होता है उनका, वहाँ की मिट्टी लाल है, हर अनाज और फल मे कॅल्षियम और आइरन अधिक होता है. लाल मिट्टी मे भरपूर कॅल्षियम और आइरन है.
गर्भवती माता को आध्यात्मिक,ज्ञान वाली किताबें पढ़नी चाहिए ! बच्चा का उस पर प्रभाव होता है ! कहा जाता है अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने गर्भ मे चक्रव्यू भेदने की विधि सीखी थी !!
– नाड़ी और गोत्र का मिलान होता है ताकि ‘डी एन ए’ एक ना हो. प्रेम विवाह भी करें तो इन बातों का ध्यान रखें, नही तो प्रेम छूट जाएगा और विवाह घिसट घिसट कर चलेगा. डोपमाइन केमिकल के प्रभाव से प्रेम भाव उत्पन्न होता है, वो शीघ्र ही समाप्त हो जाता है.
10. पति पत्नी का ब्लड ग्रूप अलग रहे तो अच्छा.
11. पति पत्नी सर्वदा दक्षिण दिशा मे सिर करके सोएँ.
12. यदि गर्भाधान हो गया तो अब क्या करें? उपरोक्त जानकारी के बिना | ऐसे मे हमे उत्तम संतान प्राप्त हो इसके लिए क्या करें?
– माता का भोजन अच्छा होते ही जाना चाहिए. दूध, ताक, दही, मक्खन, लोनी, छ्छाच्छ भरपूर खाना है. याद रखिए, देशी गोमता का ही. घबराएँ नही वजन नही बढ़ेगा.
– भरपूर कॅल्षियम आपके शरीर मे रहे, मतलब चूना बराबर खाते रहना, केला, मूँगफली दाना, तिल. इन चीज़ों मे भरपूर कॅल्षियम है.
– समय से भोजन समय से आराम. लंच करिए 10 बजे भरपेट, डिन्नर शाम 5-6 बजे, बीच मे भूख लगे तो जूस, फल, मूँगफली दाना, गुड, तिल पट्टी, दही खाना. सुबह शाम भोजन भरपेट.
– पहले महीने से सातवे महीने तक थोड़ा थोड़ा श्रम करते रहें, जाता चलाना, चटनी बनाना, कपड़े धोना, झाड़ू पोंच्छा, सब हाथ से करें, मशीन से नही.
– पहले दिन से 9 महीने, 9 दिन, 9 घंटे तक गर्भवती माता को कोई मानसिक तनाव नही देना नही तो दुष्परिणाम 10 गुना तक बच्चे को मिलेगा.
– गर्भवती माता को जो जो पसंद नही है वो उतने दीनो तक घर मे नही होना चाहिए.
– यदि इन बातों का ध्यान नही दिया तो बच्चा बाहर आकर जिंदगी भर आपको त्रास देगा.
– सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का असर गर्भवती महिला पर होता है, सूर्य ग्रहण बच्चे के लिए बड़ा तकलीफ़ वाला होता है, चंद्र ग्रहण उतना नही होता. सूर्य ग्रहण मे ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ होता है, तो ऐसे मे माता को आराम करना चाहिए और बाहर नही निकलना चाहिए.